हारू ड्यौढ़ी पर बैठा अपने विवाह के बारे में सोच ही रहा था कि तभी एक बूढ़ा साधु वहाँ आ पहुँचा। साधु बहुत थका हुआ लग रहा था।
हारू तुरंत उठकर बोला,
“बाबा, आप थक गए होंगे, आइए अंदर बैठिए।”
उसने साधु को पानी पिलाया और जो थोड़ा-बहुत खाना था, वह भी प्रेम से खिला दिया। साधु हारू की सेवा से बहुत प्रसन्न हुआ।
साधु ने कहा,
“बेटा, मैं तुम्हारी भक्ति और सेवा से खुश हूँ। मैं तुम्हें तीन वरदान देता हूँ। जो चाहो मांग लो।”
हारू पहले तो घबरा गया, फिर सोचने लगा—“अब मेरी किस्मत बदल सकती है!”
साधु ने उसे एक जादुई डंडा देते हुए कहा,
“जब भी तुम इस डंडे को ज़मीन पर मारकर कुछ मांगोगे, तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। लेकिन ध्यान रखना—सिर्फ तीन बार ही इसका उपयोग कर सकते हो।”
यह कहकर साधु वहाँ से गायब हो गया।
पहला वरदान (गलती की शुरुआत)
हारू खुशी-खुशी घर के अंदर गया और सोचने लगा कि क्या मांगे।
उसी समय उसे अपने ऊपर हँसने वाले गाँव के बच्चे याद आए। गुस्से में आकर उसने डंडा ज़मीन पर पटका और बोला—
“मेरी नाक बहुत सुंदर और बड़ी हो जाए!”
जैसे ही उसने कहा, उसकी नाक अचानक बहुत बड़ी हो गई… लेकिन इतनी बड़ी कि उसका चेहरा ही बिगड़ गया!
अब लोग पहले से भी ज़्यादा उसका मजाक उड़ाने लगे।
दूसरा वरदान (घबराहट में फैसला)
हारू बहुत परेशान हो गया। उसने सोचा—“अब तो मेरी हालत और खराब हो गई!”
जल्दबाज़ी में उसने फिर डंडा पटका और बोला—
“मेरी नाक गायब हो जाए!”
बस क्या था—उसकी नाक पूरी तरह गायब हो गई!
अब तो वह और भी अजीब दिखने लगा। लोग उसे देखकर डरने लगे।
तीसरा वरदान (सीख और समझदारी)
अब हारू को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सोचा—
“मैंने बिना सोचे-समझे अपने वरदान बर्बाद कर दिए। अगर मैं समझदारी से मांगता तो मेरी जिंदगी बदल सकती थी।”
अब उसके पास केवल एक वरदान बचा था।
इस बार उसने शांत होकर सोचा और फिर डंडा पटका—
“हे भगवान! मुझे मेरी पहले वाली साधारण नाक वापस मिल जाए।”
तुरंत उसकी नाक पहले जैसी हो गई।
अंत और सीख
हारू ने गहरी सांस ली और कहा—
“अब मैं समझ गया हूँ कि खुश रहना ही सबसे बड़ा सुख है।”
उसने मेहनत करना जारी रखा और अपने जीवन से संतुष्ट रहने लगा।
सीख (Moral)
👉 बिना सोचे-समझे लिए गए फैसले हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं।
👉 संतोष और समझदारी ही असली सुख है।
👉 जो हमारे पास है, उसकी कद्र करनी चाहिए।
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