एक घने जंगल में एक लकड़बग्घा रहता था। वह बहुत चालाक और दुष्ट स्वभाव का था। एक दिन वह जंगल में घूमते-घूमते एक झील के किनारे पहुँच गया। झील के पास जमीन दलदली थी। अचानक उसका पैर फिसल गया और वह दलदल में फँस गया।
लकड़बग्घा बहुत कोशिश करता रहा, लेकिन जितना निकलने की कोशिश करता, उतना ही ज्यादा दलदल में धँसता जाता। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा और अपनी जान बचाने की कोशिश करने लगा।
उसी समय वहाँ एक बैल पानी पीने के लिए झील पर आया। उसने देखा कि लकड़बग्घा दलदल में फँसकर छटपटा रहा है। बैल का दिल बहुत दयालु था। उसे लकड़बग्घे पर दया आ गई।
झील के पास पेड़ों से कुछ लताएँ लटक रही थीं। बैल ने उन लताओं को तोड़ा और दलदल में फेंक दिया। उसने लकड़बग्घे से कहा —
“भाई, इन लताओं को कसकर पकड़ लो। मैं तुम्हें बाहर खींचने की कोशिश करता हूँ।”
लकड़बग्घे ने तुरंत लता पकड़ ली। बैल ने पूरी ताकत लगाकर उसे खींचा और आखिरकार लकड़बग्घा दलदल से बाहर निकल आया।
बाहर आते ही लकड़बग्घे ने बैल को धन्यवाद दिया और बोला —
“मित्र, तुमने मेरी जान बचाई है। मैं तुम्हारा यह उपकार कभी नहीं भूलूँगा।”
उस दिन के बाद से दोनों में मित्रता हो गई। लेकिन लकड़बग्घा अंदर से बहुत दुष्ट था। वह केवल दोस्ती का नाटक कर रहा था। असल में वह बैल का शिकार करना चाहता था, पर अकेले उसके लिए यह संभव नहीं था।
कुछ दिनों बाद लकड़बग्घे ने एक चालाक योजना बनाई।
एक दिन उसने बैल से कहा —
“मित्र, कल मेरा जन्मदिन है। मैंने अपने सभी रिश्तेदारों को भोजन के लिए बुलाया है। मैं चाहता हूँ कि तुम भी मेरे घर आकर मेरे साथ भोजन करो।”
भोला-भाला बैल उसकी चाल समझ नहीं पाया। उसने तुरंत कहा —
“मित्र, मैं जरूर आऊँगा।”
अगले दिन बैल बिना कुछ सोचे-समझे लकड़बग्घे के घर पहुँच गया। वहाँ पहले से ही कई लकड़बग्घे छिपकर बैठे थे और बैल के आने का इंतजार कर रहे थे।
जैसे ही बैल वहाँ पहुँचा, सभी लकड़बग्घे उस पर टूट पड़े। बेचारा बैल अकेला था। वह उनका मुकाबला नहीं कर सका। अंत में लकड़बग्घों ने मिलकर बैल का शिकार कर लिया और उसे खाकर अपना पेट भर लिया।
सीख (Moral)
दुष्ट और स्वार्थी लोगों की मदद करने से पहले सोच-समझ लेना चाहिए।
दुश्मन या कपटी व्यक्ति पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।
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