छोटी गिलहरी से मिली बड़ी सीख | मोटिवेशनल बोधकथा

एक संत एक दिन संसार के दुखों से व्याकुल होकर सत्य की खोज में निकल पड़े।  वैभव, सुख-सुविधाएँ और परिवार सब पीछे छूट गया, पर उनके मन में एक ही लक्ष्य था—जीवन के वास्तविक सत्य को जानना।
लेकिन यह मार्ग आसान नहीं था। जंगलों में भटकना, कठोर तपस्या करना, भूख-प्यास सहना—इन सबने उनके शरीर को ही नहीं, बल्कि मन को भी थका दिया। कई बार उनके मन में यह विचार उठता—“क्या मैं गलत रास्ते पर आ गया हूँ? क्या मुझे वापस घर लौट जाना चाहिए?”
एक दिन, जब उनका मन पूरी तरह डगमगाने लगा, वे सचमुच घर कि ओर लौटने लगे। तभी उनकी नजर एक छोटी-सी गिलहरी पर पड़ी।
वह गिलहरी बार-बार झील के पास जाती, अपनी पूंछ पानी में डुबोती और फिर उसे बाहर निकालकर रेत पर झटक देती। यह क्रम वह लगातार दोहराए जा रही थी।
संत ने आश्चर्य से सोचा—
“यह नन्ही-सी गिलहरी क्या कर रही है?”
ध्यान से देखने पर उन्हें लगा कि वह झील को सुखाने का प्रयास कर रही है। यह कार्य असंभव था। लाखों-करोड़ों बार ऐसा करने पर भी झील का पानी खत्म नहीं हो सकता था।
फिर भी, गिलहरी बिना थके, बिना रुके अपने प्रयास में लगी हुई थी—न उसे असफलता का डर था, न सफलता की चिंता।
यह दृश्य देखकर संत के भीतर कुछ बदल गया।
उन्होंने सोचा—
“जब यह छोटी-सी गिलहरी बिना परिणाम की चिंता किए अपने लक्ष्य में लगी रह सकती है, तो मैं क्यों हार मान रहा हूँ? मेरा लक्ष्य तो इससे कहीं अधिक महान है।”
उसी क्षण उन्होंने अपने मन की कमजोरी को त्याग दिया और वापस मुड़कर फिर से तपस्या में लग गए।
उनके इसी अडिग संकल्प और निरंतर प्रयास ने अंततः उन्हें महान संत बना दिया—एक ऐसे महापुरुष, जिन्होंने दुनिया को ज्ञान और शांति का मार्ग दिखाया।
कथासार:
मन से हार मान लेना ही सबसे बड़ी हार है। यदि संकल्प मजबूत हो, तो असंभव भी संभव बन सकता है।

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