ध्रुव का अटल वैराग्य और नारायण भक्ति
राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव बाल्यावस्था से ही असाधारण बुद्धि और दृढ़ निश्चय वाले थे। मात्र पाँच वर्ष की आयु में उनके हृदय में संसार से वैराग्य उत्पन्न हो गया। एक दिन वे महान ऋषियों के पास जाकर बोले—
“हे मुनिवरों! मैं राजा उत्तानपाद का पुत्र हूँ। मेरे मन में संसार से वैराग्य जाग उठा है। आप सब कृपा करके मुझे भगवान नारायण के भजन का उपदेश दीजिए।”
ऋषियों ने ध्रुव की अल्प आयु देखकर कहा—
“वत्स! तू तो अभी केवल पाँच वर्ष का बालक है। तूने न तो संसार के सुख देखे हैं और न ही शीत-उष्ण, लाभ-हानि का अनुभव किया है। योग और वैराग्य तेरे लिए अभी उपयुक्त नहीं हैं।”
यह सुनकर ध्रुव अडिग स्वर में बोले—
“यदि आप मुझे उपदेश नहीं देंगे, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा।”
ध्रुव की यह दृढ़ प्रतिज्ञा सुनकर ऋषि आश्चर्यचकित हो गए। वे आपस में विचार करने लगे—
“यह कोई साधारण बालक नहीं है। संभव है यह अपनी अटल श्रद्धा से स्वयं भगवान गोविंद को प्राप्त कर ले।”
तब ऋषियों ने ध्रुव से पूछा—
“वत्स! तेरा प्रयोजन क्या है?”
ध्रुव ने विनम्र किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—
“मैं ऐसे पद को प्राप्त करना चाहता हूँ, जहाँ आज तक कोई भी न पहुँचा हो।”
ऋषियों के उपदेश
तब एक-एक कर महर्षियों ने ध्रुव को उपदेश दिया—
सरीचि ऋषि बोले —
“हे पुत्र! श्रीगोविंद का भजन कर। ऐसा कौन है जिसकी कामना गोविंद की शरण में जाकर पूर्ण न हुई हो?”
अत्रि ऋषि बोले —
“मन से वासनाओं को हटाकर जो सबसे ऊपर परम तत्त्व है, उसमें चित्त को स्थिर कर। तब तुझे सब कुछ प्राप्त होगा।”
अंगिरा ऋषि बोले —
“जो तेरे मन में स्थित है और ब्रह्मा से लेकर चींटी तक सब में व्याप्त है, वही परमात्मा है। यदि तू ऊँचे पद की इच्छा रखता है, तो उसी का चिंतन कर।”
कतु ऋषि बोले —
“यज्ञपुरुष परमात्मा को भजन द्वारा प्रसन्न कर। उनकी कृपा से तेरी कामना अवश्य पूर्ण होगी।”
पुलह ऋषि बोले —
“यदि इंद्र के पद से भी ऊँचा पद चाहता है, तो जिसके शरण में सम्पूर्ण जगत है, उसी को स्मरण कर।”
वसिष्ठ मुनि बोले —
“लोक और परलोक की सिद्धि का एक ही उपाय है—परमेश्वर के ध्यान में लीन होना। विषयों का त्याग कर नारायण से प्रेम कर।”
भृगु मुनि बोले —
“जब तक कामनाओं का नाश नहीं होता, तब तक परम पद की प्राप्ति नहीं होती। किंतु तू तो अटल पद का अधिकारी है।”
ध्रुव की सिद्धि
ऋषियों के उपदेश पाकर ध्रुव ने भगवान नारायण की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति इतनी अटल थी कि स्वयं श्रीहरि प्रकट हुए और उन्हें ऐसा दिव्य पद प्रदान किया जो आज भी ध्रुव लोक के नाम से अचल है।
कथा का संदेश
यह कथा सिखाती है कि—
आयु नहीं, श्रद्धा और संकल्प बड़ा होता है
सच्ची भक्ति से असंभव भी संभव हो जाता है
भगवान नारायण अपने भक्त की भावना देखते हैं, न कि उसकी अवस्था
🙏 जय श्री नारायण 🙏<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
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