एक गाँव में केशव नाम का एक निर्धन किसान रहता था। उसके पास न धन था, न बड़ा घर—बस था तो केवल भगवान शिव पर अटूट विश्वास। वह प्रतिदिन प्रातःकाल नदी से जल लाकर पास के छोटे से शिवलिंग पर अर्पित करता और कहता—
“हे भोलेनाथ, मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस आपकी कृपा बनी रहे।”
एक वर्ष भयंकर सूखा पड़ा। खेत सूख गए, अन्न समाप्त हो गया। गाँव के लोग हताश हो गए, पर केशव की भक्ति कम नहीं हुई। एक दिन उसकी पत्नी ने कहा—
“घर में कुछ भी नहीं बचा, अब पूजा कैसे होगी?”
केशव मुस्कुराया और बोला—
“जब तक साँस है, तब तक भक्ति है।”
अगले दिन वह खाली हाथ मंदिर पहुँचा। न जल था, न बेलपत्र। उसने अपनी आँखों से आँसू गिराए और शिवलिंग से कहा—
“प्रभु, आज देने को कुछ नहीं, पर मन आपका ही है।”
उसी क्षण आकाश में बादल घिर आए। जोरदार वर्षा होने लगी। सूखी धरती हरियाली से भर गई। गाँव के लोग चकित रह गए।
रात में केशव को स्वप्न में भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा—
“केशव, जो बिना स्वार्थ भक्ति करता है, उसकी झोली मैं स्वयं भर देता हूँ।”
उसके बाद केशव का जीवन कभी अभाव में नहीं रहा। वह सदा दूसरों की सहायता करता और कहता—
“भोलेनाथ सबसे पहले दिल देखते हैं, दान नहीं।”
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