जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के समय गंगा नदी के तट पर पहुँचे, तो उन्हें नदी पार करनी थी। वहाँ केवट नाम का एक साधारण नाविक रहता था।
केवट ने श्रीराम को पहचान लिया। वह हाथ जोड़कर बोला—
“प्रभु, मैं आपको नाव में बैठा तो लूँगा, पर पहले आपके चरण धोऊँगा।”
लक्ष्मण को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा—
“केवट, जल्दी करो, हमें आगे जाना है।”
केवट विनम्रता से बोला—
“प्रभु, मैंने सुना है कि आपके चरणों की धूल से पत्थर भी नारी बन गया। मेरी नाव लकड़ी की है, कहीं नारी न बन जाए, इसलिए चरण धोना आवश्यक है।”
यह सुनकर श्रीराम मुस्कुरा दिए। उन्होंने प्रेमपूर्वक अपने चरण आगे बढ़ाए। केवट ने श्रद्धा से चरण धोए और उस चरणामृत को अपने मस्तक पर लगाया।
नदी पार होने के बाद श्रीराम ने केवट को उतराई देनी चाही। केवट हाथ जोड़कर बोला—
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233“प्रभु, मैंने आपको नदी पार कराई और आपने मुझे भवसागर से पार कर दिया। अब मेरा कर्ज़ उतर गया।”
भगवान राम की आँखों में करुणा भर आई। उन्होंने केवट को गले लगाया और कहा—
“केवट, तुम्हारी भक्ति अमूल्य है।”
शिक्षा:
भगवान धन या वैभव नहीं देखते, वे निष्काम भक्ति और सच्चे प्रेम से प्रसन्न होते हैं।
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