https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन में गुरुकुल में साथ पढ़ते थे। एक अमीर राजकुमार था, दूसरा अत्यंत गरीब ब्राह्मण—पर उनकी मित्रता में कभी कोई भेद नहीं आया।
समय बीत गया। श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए, और सुदामा गरीबी में जीवन बिताने लगे। पत्नी के आग्रह पर सुदामा कुछ सहायता माँगने द्वारका गए। उनके पास भेंट में देने के लिए केवल मुट्ठी भर चिवड़ा था।
जब सुदामा द्वारका पहुँचे, श्रीकृष्ण उन्हें दूर से ही पहचान गए। राजमहल छोड़कर दौड़ते हुए आए, सुदामा को गले लगाया और अपने आसन पर बैठाया। स्वयं उनके पैर धोए।
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233श्रीकृष्ण ने प्रेम से चिवड़ा छीना और खाने लगे। रुक्मिणी जी ने कहा—
“प्रभु, यह क्या कर रहे हैं?”
कृष्ण मुस्कुराए—
“रुक्मिणी, यह चिवड़ा नहीं, मेरे मित्र का प्रेम है।”
सुदामा बिना कुछ माँगे ही लौट आए। जब वे अपने घर पहुँचे, तो देखा—झोपड़ी महल बन चुकी थी, गरीबी समृद्धि में बदल गई थी।
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