माँ अन्नपूर्णा देवी, भगवान शिव की पत्नी पार्वती का ही रूप हैं, जिन्हें भोजन और अन्न की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।
उनकी कथा हमें यह सिखाती है कि ज्ञान और तप से पहले शरीर का पोषण आवश्यक है, और भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा धर्म है।
🕉️ शिव और पार्वती का संवाद
एक दिन भगवान शिव ने देवी पार्वती से कहा:
"यह संसार माया है, शरीर भी भ्रम है, और अन्न भी माया है।"
माँ पार्वती मुस्काईं और बोलीं:
"अगर अन्न माया है, तो यह शरीर कैसे चलेगा? क्या तपस्वी, ज्ञानी और योगी भी बिना अन्न के रह सकते हैं?"
भगवान शिव हँस दिए, लेकिन माँ पार्वती गंभीर हो गईं और उन्होंने समस्त संसार से अन्न को लुप्त कर दिया।
🌾 भूख से तड़पता संसार
जब अन्न ही नहीं रहा, तो लोग भूखे मरने लगे। यज्ञ रुक गए, पूजा बंद हो गई, ब्राह्मणों ने पाठ करना छोड़ दिया।
तब भगवान शिव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने माँ पार्वती से क्षमा माँगी।
🏵️ काशी में माँ अन्नपूर्णा का प्रकट होना
माँ पार्वती ने तब काशी (वाराणसी) में अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट होकर, अपने हाथों से अन्न बाँटना शुरू किया।
स्वयं भगवान शिव भी भिक्षापात्र लेकर माँ के सामने खड़े हुए।
तब माँ बोलीं:
"जब तक यह शरीर है, तब तक अन्न ही आत्मा को टिकाए रखता है। भूखे को अन्न देना ही सच्चा ज्ञान है।"
🌟 सीख:
माँ अन्नपूर्णा की यह कथा हमें सिखाती है कि
भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य है,
अन्न का सम्मान करो,
और अहंकार से ज्ञान नहीं, विनम्रता से कृपा मिलती है।
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