"अमृत की खोज: देव और दानवों की परीक्षा"


https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233(एक शिक्षाप्रद पौराणिक कथा)

प्राचीन समय की बात है। देवताओं और दानवों के बीच स्वर्ग को लेकर भीषण संघर्ष चल रहा था।
देवता चाहते थे कि दानव स्वर्ग से चले जाएँ, और दानव यह चाहते थे कि देवताओं को स्वर्ग से निकालकर स्वयं उस पर अधिकार करें।

दोनों पक्षों में लड़ाइयाँ हो रही थीं, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल रहा था। ऐसे में भगवान नारद जी ने दोनों पक्षों को शांति का मार्ग सुझाने के लिए भगवान विष्णु के पास जाने की सलाह दी।

जब देवता और दानव भगवान विष्णु के समक्ष पहुँचे, तो विष्णु जी ने दोनों को धैर्यपूर्वक समझाया, पर कोई भी पक्ष मानने को तैयार नहीं था।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233तब भगवान विष्णु ने एक उपाय बताया। उन्होंने कहा,
"मैं एक कार्य बतलाता हूँ। तुम दोनों दलों को समुद्र मंथन करना होगा। जो पक्ष पहले मंथन से अमृत निकाल लेगा, स्वर्ग पर उसी का अधिकार होगा। क्या यह नियम सभी को स्वीकार है?"

दोनों पक्षों ने एक स्वर में कहा —
"हाँ, हम तैयार हैं!"

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233इसके बाद देवता और दानव मिलकर मंथन की तैयारी में लग गए। मंदार पर्वत को मंथन-दंड बनाया गया और नागराज वासुकी को रस्सी की तरह प्रयोग किया गया।

मंथन शुरू हुआ, तो पहले विष (हलाहल) निकला, जिसे भगवान शिव ने पी लिया। फिर क्रम से कामधेनु, ऐरावत, कल्पवृक्ष, लक्ष्मी माता और अंत में अमृत कलश निकला।

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233अमृत को लेकर विवाद ना हो, इसलिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और अपनी चालाकी से सारा अमृत देवताओं को बाँट दिया।

दानव ठगे रह गए और इस तरह से देवताओं को अमरता प्राप्त हुई और स्वर्ग का अधिकार उन्हीं को मिला।

यह कहानी हमें सिखाती है कि संघर्ष से अधिक महत्वपूर्ण है समझदारी, संयम और भगवान पर विश्वास|


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