काली कमली की कथा


https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233एक बार श्यामसुंदर को बुरी नजर लग गई। लाला अचानक उदास हो गया, उसका मन किसी बात में नहीं लग रहा था। यशोदा मैया बहुत चिंतित हो उठीं—क्या करूं, कैसे अपने लाल की ये नजर उतारूं? उन्होंने कई उपाय किए, पर नजर टलती ही नहीं थी।

तभी नंदगांव की पूर्णमासी पुरोहितानी आईं और उन्होंने कहा, “मैया, अगर बरसाने की राधा का कोई पुराना वस्त्र श्यामसुंदर को पहना दिया जाए, तो नजर उतर जाएगी।”

यह सुनते ही यशोदा मैया एक पल भी न रुकीं। ना सर्दी की परवाह की, ना समय की—सुबह हो या शाम, उनके लिए तो बस एक ही चिंता थी, लाला को नजर ना लगे। वे तुरंत चल पड़ीं बरसाने की ओर।

बरसाने पहुँचकर, उन्होंने राधा रानी की माता कीर्ति मैया से विनती की—“मेरा लाला बहुत पीड़ा में है, नजर लगी है। पूर्णमासी पुरोहितानी ने कहा है कि राधा का कोई पुराना वस्त्र मिल जाए तो नजर उतर जाएगी।”

कीर्ति मैया थोड़ी संकोच में पड़ गईं। बोलीं, “हाय मैया, आप कैसी बात कर रही हैं! नंद बाबा तो हमारे राजा हैं, हम अपनी लाली का पुराना वस्त्र कैसे दे सकते हैं?”

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ये सब बातें राधा रानी भीतर खड़ी सुन रही थीं। उन्होंने एक पल भी देर न की। बाहर आईं और दृढ़ स्वर में बोलीं, “श्यामसुंदर को नजर न लगे, उसके लिए मैं पुराना वस्त्र क्या, अपने प्राण भी अर्पण कर सकती हूँ।” यह कहकर उन्होंने सर्दी में ओढ़ी अपनी काली कमली उतारी और यशोदा मैया को सौंप दी।

उसी दिन से कन्हैया काली कमली ओढ़ने लगे। अब उन्हें नजर नहीं लगती। वह काली कमली सिर्फ एक वस्त्र नहीं, राधा रानी की भक्ति और प्रेम की प्रसादी है—जिसे श्यामसुंदर आज भी अपने से अलग नहीं करते|

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