:"पृथ्वी माता की पुकार और श्रीकृष्ण अवतार का वचन"


बहुत पुराने समय की बात है। पृथ्वी (धरती माता) राक्षसों और अधर्मियों के अत्याचारों से अत्यंत दुखी और बोझिल हो गई थी। पाप और अन्याय इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने लगा था। व्यथित होकर वह गाय का रूप धारण कर सुमेरु पर्वत पर भगवान ब्रह्मा के पास पहुंची। उसकी आंखों में आंसू थे और ह्रदय भय व पीड़ा से कांप रहा था।

पृथ्वी ने भगवान ब्रह्मा से करुण पुकार करते हुए कहा, "प्रभु! उग्रसेन का पुत्र कंस अत्याचार की सारी सीमाएं पार कर चुका है। उसने अरिष्टासुर, धेनुकासुर, केशी, प्रलंबासुर, नरकासुर, और सुंद जैसे अनेक बलवान राक्षसों को अपने साथ मिला लिया है। ये सभी मिलकर धर्म का नाश कर रहे हैं, और निर्दोष जीवों पर अत्याचार कर रहे हैं। मैं असहाय हो गई हूँ। कृपया मेरी रक्षा करें।"

पृथ्वी माता की करुणा भरी पुकार सुनकर भगवान ब्रह्मा चिंतित हो उठे। वे पृथ्वी को साथ लेकर अन्य देवताओं के साथ क्षीर सागर के तट पर पहुंचे, जहां भगवान विष्णु योगनिद्रा में विश्राम कर रहे थे। सब देवताओं ने मिलकर भगवान विष्णु की स्तुति की और सहायता के लिए प्रार्थना की।

भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर कहा, "हे देवगण और पृथ्वी माता! चिंता मत करो। धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं स्वयं अवतार लूंगा। मैं यदुकुल में वसुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। मेरी एक अंशशक्ति संकर्षण (बलराम) के रूप में प्रकट होगी। कृष्ण और बलराम, दोनों भाई मिलकर कंस सहित सभी अधर्मी राक्षसों का नाश करेंगे। धरती का भार अवश्य ही कम हो जाएगा।"

भगवान विष्णु का वचन सुनकर सभी देवताओं और पृथ्वी माता के ह्रदय में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। पृथ्वी माता ने श्रद्धा और आभार से भगवान विष्णु की वंदना की और संतोष के साथ लौट गई। अब उसे विश्वास था कि अधर्म का अंत निकट है और धरती पर पुनः धर्म और शांति का राज्य स्थापित होगा।

इस प्रकार भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त करने का वचन दिया|

Post a Comment

0 Comments