"प्रभु की अद्भुत लीला"


प्रभु की अद्भुत लीला

गाँव के एक कोने में एक निर्धन ब्राह्मण अपनी बेटी के साथ रहता था। उसकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो गया था, और अब उसकी पूरी दुनिया उसकी बेटी थी। ब्राह्मण विद्वान और भक्त था, लेकिन निर्धनता के कारण बेटी की शादी को लेकर चिंतित था।

उसने कई जगह प्रयास किया, लेकिन कहीं से भी मदद नहीं मिली। निराश होकर वह बिहारी जी (श्रीकृष्ण) के मंदिर में गया और रोते हुए बोला, "हे प्रभु! मैं तो तेरे दर पर आया हूँ। तू ही मेरी लाज रख।"

कुछ ही दिनों बाद, एक अच्छे घर से रिश्ता आया, और बिना किसी बाधा के शादी तय हो गई। ब्राह्मण को अब सबसे बड़ी चिंता थी—शादी का खर्च! लेकिन जैसे ही शादी का दिन आया, अजीब घटनाएँ घटने लगीं। किसी ने बढ़िया कपड़े भिजवा दिए, किसी ने गहने दे दिए, किसी ने भोजन का प्रबंध कर दिया। ब्राह्मण यह सब देखकर हैरान था लेकिन उसने इसे प्रभु की इच्छा मान लिया।

शादी अच्छे से संपन्न हो गई। जब ब्राह्मण बेटी को विदा कर मंदिर पहुँचा तो बिहारी जी को धन्यवाद दिया और इस अद्भुत लीला को हरि इच्छा मानकर शांत हो गया।

कुछ दिनों बाद, बेटी की शादी की तस्वीरें आईं। पूरा परिवार बैठा और उत्सुकता से तस्वीरें देखने लगा। ब्राह्मण ने सोचा, देखें तो सही, शादी में सब कुछ कैसा था! लेकिन जैसे ही उसने तस्वीरें देखीं, वह चौंक गया! हर तस्वीर में, हर रस्म में एक अजनबी व्यक्ति पिता के रूप में खड़ा था—लड़की के कन्यादान से लेकर विदाई तक, हर जगह वही मौजूद था।

ब्राह्मण की आँखों से आँसू बहने लगे। वह जोर-जोर से रोने लगा और बोला, "हे बिहारी जी! यह आपने क्या कर दिया? यह आपकी कैसी लीला है?"

रोते-रोते वह दौड़कर मंदिर पहुँचा। प्रभु के चरणों में गिर पड़ा और बोला, "मैं जीवन भर आपका भक्त रहा, लेकिन यह नहीं जानता था कि आप मेरे पिता भी हैं, मेरे संरक्षक भी!"

मंदिर में बैठे पुजारी ने मुस्कुराते हुए कहा, "ब्राह्मण देव, आप अब भी नहीं समझे? जिसने तुम्हारी बेटी के लिए पिता का धर्म निभाया, वह कोई और नहीं, स्वयं बिहारी जी थे!"

ब्राह्मण स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने बिहारी जी की मूर्ति को देखा और हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! आप कितने दयालु हैं, आपने मेरी लाज रख ली।"

उस दिन से ब्राह्मण का विश्वास और भी दृढ़ हो गया। उसने कभी भी अपने जीवन की कठिनाइयों को लेकर शिकायत नहीं की, क्योंकि उसे पता चल गया था—जहाँ सच्ची भक्ति होती है, वहाँ स्वयं भगवान आकर भक्त का बोझ उठा लेते हैं।

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