यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम भक्तों की है।
बनों लोकों में एक समय ऐसा हुआ जब देवर्षि नारद राधा जी की स्तुति से खीझ गए। उनका सवाल था कि जब वह भगवान श्रीकृष्ण से अथाह प्रेम करते हैं, तो हर भक्त "राधे-राधे" क्यों कहता है। इसी सोच और व्यथा के साथ, नारदजी भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।
जब नारदजी पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण सिर दर्द से कराह रहे हैं। उनका मन द्रवित हो उठा। उन्होंने पूछा, "भगवन! यह सिर दर्द क्यों हो रहा है? और क्या इसका कोई उपाय है?"
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले, "नारदजी, मेरा सिर दर्द तभी शांत होगा, जब कोई भक्त अपने पांव धोकर मुझे चरणामृत पीने के लिए देगा।"
नारदजी हतप्रभ रह गए। उन्होंने सोचा, "भक्त का चरणामृत और भगवान के श्रीमुख में? यह तो पाप होगा। ऐसा करने वाला नरक का भागी बनेगा। भला, इस बात को मानने वाला कौन होगा?"
श्रीकृष्ण ने नारदजी को रुक्मिणी के पास जाने का सुझाव दिया। वह रुक्मिणी के पास गए और उनकी समस्या बताई। लेकिन रुक्मिणी ने भी चरणामृत देने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, "मैं ऐसा पाप नहीं कर सकती। इससे मुझे घोर नरक भोगना पड़ेगा।"
फिर नारदजी ने गांव में जाकर कृष्ण के अन्य भक्तों से बात की। लेकिन कोई भी इस कार्य के लिए तैयार नहीं हुआ। अंततः नारदजी राधारानी के पास गए। उन्होंने जैसे ही यह बात सुनी, बिना सोचे-समझे उन्होंने चरणामृत भगवान के लिए देने को कहा।
नारदजी ने पूछा, "क्या आपको डर नहीं कि ऐसा करने से आपको नरक भोगना पड़ेगा?"
राधारानी ने उत्तर दिया, "मेरे लिए भगवान का सुख ही सबसे बड़ा स्वर्ग है। यदि मेरे चरणामृत से उनका दर्द शांत होता है, तो मुझे नरक जाने का डर नहीं।"
राधारानी की भक्ति और निस्वार्थ प्रेम ने नारदजी को गहराई से सीख दी। उन्होंने समझा कि भक्ति का असली अर्थ भगवान के प्रति निःस्वार्थ प्रेम है, जो राधारानी ने दिखाया।
कहानी का संदेश यह है कि सच्ची भक्ति स्वार्थ और भय से परे होती है। यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम का प्रतीक है।
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