kahani hindi storyकंजूस गीदड़ की कहानी


एक घने जंगल में एक गीदड़ रहता था। वह बड़ा चालाक और होशियार था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह बहुत कंजूस था। उसकी कंजूसी पैसों से जुड़ी नहीं थी, बल्कि खाने को लेकर थी। जहाँ दूसरे गीदड़ अपने शिकार को भरपेट खाकर दो दिन तक आराम करते थे, वहाँ यह गीदड़ अपने शिकार को छोटे-छोटे टुकड़ों में खाता ताकि वह ज्यादा दिनों तक चल सके।

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एक दिन की बात है, गीदड़ ने जंगल में घूमते-घूमते एक खरगोश का शिकार किया। वह बड़ा खुश हुआ, लेकिन उसकी कंजूसी ने उसे रोक लिया। उसने सोचा, "अगर मैं इस खरगोश को आज पूरा खा लूँगा, तो कल क्या खाऊँगा? इससे अच्छा है कि मैं इसे थोड़ा-थोड़ा खाऊँ और चार दिन तक काम चलाऊँ।"

गीदड़ ने खरगोश को खाया, लेकिन सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा। बाकी बचा हुआ शिकार उसने एक पेड़ के नीचे छिपा दिया। अगले दिन जब वह अपने छिपाए हुए शिकार को खाने पहुँचा, तो उसने देखा कि वहाँ सिर्फ हड्डियाँ बची थीं। कोई और जंगली जानवर उसका बचा हुआ शिकार खा चुका था।

गीदड़ को बहुत गुस्सा आया। उसने सोचा, "अब मैं अगली बार अपना शिकार और अच्छे से छिपाऊँगा।"

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कुछ दिनों बाद, गीदड़ ने एक और शिकार किया। इस बार उसने एक छोटे से गड्ढे में शिकार को छिपा दिया और ऊपर पत्ते डाल दिए। लेकिन जब वह अगले दिन वहाँ पहुँचा, तो उसने देखा कि चींटियाँ और गिद्ध उसका बचा हुआ मांस खा गए थे।

अब गीदड़ को समझ में आने लगा कि उसकी कंजूसी की वजह से उसका खुद का पेट खाली रह जाता है। वह मन ही मन सोचने लगा, "अगर मैं पहले ही भरपेट खा लेता, तो मुझे बार-बार भूखे नहीं रहना पड़ता। मुझे अपनी कंजूसी छोड़ देनी चाहिए।"

उस दिन से गीदड़ ने अपनी आदत बदल ली। वह जितना शिकार करता, उतना ही खाता और बाकी के लिए चिंता नहीं करता। वह जान गया था कि जरूरत से ज्यादा कंजूसी करना कभी-कभी नुकसानदेह हो सकता है।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि कंजूसी एक हद तक ही अच्छी होती है। जरूरत से ज्यादा कंजूसी कभी-कभी हमारे लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

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