एक बार की बात है, एक निर्धन ब्राह्मण अपने पेट की भूख मिटाने के लिए एक नगर से होकर गुजर रहा था। वह ब्राह्मण सरल, विद्वान और ईश्वर भक्त था, परंतु जीवन-यापन के लिए उसे दूसरों से भिक्षा माँगनी पड़ती थी।
जब उसने नगर में प्रवेश किया, तो उसने वहाँ बड़े-बड़े महल, अट्टालिकाएँ, और संपन्नता देखी। वह मन ही मन सोचने लगा, "यह नगर तो धन-धान्य से परिपूर्ण लगता है। यहाँ मुझे अवश्य भिक्षा मिल जाएगी।"
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ब्राह्मण एक-एक घर के दरवाजे पर गया और अपनी झोली फैलाकर विनम्रता से कहा, "माता अन्नं देहि।" लेकिन कोई भी उसे अन्न देने को तैयार नहीं हुआ। कोई दरवाजा बंद कर लेता, तो कोई यह कहकर मना कर देता, "हमारे पास देने को कुछ नहीं है।"
यह देखकर ब्राह्मण को बड़ी निराशा हुई। दोपहर का समय हो गया था, और उसकी भूख बढ़ती जा रही थी। थक-हारकर वह नगर के बाहर एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
ब्राह्मण ने ईश्वर से प्रार्थना की, "हे भगवान! इस नगर में इतनी संपन्नता होते हुए भी लोग इतने कठोर और निर्दयी क्यों हैं? क्या इस संसार में धन ने मनुष्यों की दया और सहानुभूति को छीन लिया है?"
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तभी वहाँ एक वृद्ध व्यक्ति आया। वह भी एक साधारण ग्रामीण था। उसने ब्राह्मण को रोते हुए देखा और पूछा, "महाराज, क्या हुआ? आप इतने दुखी क्यों हैं?"
ब्राह्मण ने अपनी पूरी व्यथा सुनाई। वृद्ध व्यक्ति ने अपनी पोटली खोली, जिसमें दो रोटियाँ और कुछ साग था। उसने वह सारा भोजन ब्राह्मण को दे दिया और कहा, "आप इसे ग्रहण कीजिए। यह थोड़ा है, परंतु सच्चे मन से दिया गया है।"
ब्राह्मण ने भोजन ग्रहण किया और वृद्ध को आशीर्वाद दिया। उसने कहा, "आप जैसे दयालु लोग ही इस संसार में मानवता को जीवित रखते हैं। धन-दौलत से बड़ा दान दयालुता और सहानुभूति का है।"
इसके बाद, ब्राह्मण ने उस नगर को छोड़ दिया और मन ही मन ठान लिया कि वह कभी किसी की संपन्नता देखकर उसके दयालु होने का अनुमान नहीं लगाएगा।
शिक्षा: इस कहानी से यह सीख मिलती है कि सच्ची संपत्ति धन नहीं, बल्कि दया, सहानुभूति और दूसरों की मदद करने का भाव है।
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