एक बार की बात है, एक गुरु और उनका शिष्य घने जंगल के रास्ते से होकर कहीं जा रहे थे। दिन ढलने लगा, और शाम की ठंडी हवा चलने लगी। चलते-चलते उन्हें तेज प्यास लगी, लेकिन चारों तरफ जंगल ही जंगल था। तभी, दूर से उन्हें एक गांव दिखाई दिया।
गुरु और शिष्य गांव की ओर बढ़े। गांव में घुसते ही उनकी नजर एक छोटी सी झोपड़ी पर पड़ी। थके और प्यासे, दोनों झोपड़ी की तरफ गए। गुरु ने झोपड़ी के दरवाजे पर पहुंचकर आवाज लगाई, "कोई है? हम राहगीर हैं, हमें पानी चाहिए।"
कुछ पल बाद, एक बूढ़ा आदमी दरवाजा खोलकर बाहर आया। उसने सादे कपड़े पहने हुए थे और चेहरे पर शांति थी। उसने गुरु और शिष्य को देखा और कहा, "आइए, भीतर आइए। आपके लिए पानी लाता हूं।"
गुरु और शिष्य झोपड़ी के भीतर गए। वह झोपड़ी बहुत साधारण थी। चारों तरफ मिट्टी की दीवारें थीं, और फर्श पर कुछ चटाइयां बिछी हुई थीं। बूढ़े आदमी ने उन्हें लकड़ी के छोटे प्यालों में ठंडा पानी लाकर दिया। गुरु ने पानी पिया और बड़े ही विनम्र भाव से पूछा, "बाबा, आप यहां अकेले रहते हैं? आपका गुजारा कैसे होता है?"
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बूढ़े आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मेरे पास एक भैंस है। वह दूध देती है। उसी दूध को बेचकर मैं अपना गुजारा करता हूं। बचा हुआ दूध मैं पी लेता हूं और उससे दही, मक्खन बना लेता हूं। इसी से मेरी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।"
गुरु ने उसकी बात सुनी और शिष्य की ओर देखा। उन्होंने शिष्य से कहा, "देखा, संतोष का असली अर्थ यही है। यह व्यक्ति अपने पास जो कुछ है, उसी में खुश है।"
रात होने लगी थी, तो बूढ़े आदमी ने उन्हें झोपड़ी में ठहरने की अनुमति दी। अगली सुबह गुरु और शिष्य ने बूढ़े आदमी से विदा ली और अपने सफर पर निकल पड़े। रास्ते में गुरु ने शिष्य से कहा, "जीवन में जो संतोष और सरलता इस बूढ़े व्यक्ति में है, वह हमें सिखाती है कि सुख बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे भीतर है।"
यह कहानी शिष्य के दिल में गहराई से बैठ गई, और उसने निश्चय किया कि वह भी अपने जीवन में संतोष और सरलता को अपनाएगा।
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