kahani hindi storyकछुआ और खरगोश की कहानी


एक समय की बात है, एक घने जंगल के पास एक छोटा सा तालाब था, जहां कम्बुग्रीव नामक कछुआ रहता था। कछुआ बहुत ही आलसी और धीमा था, लेकिन उसकी एक खास बात यह थी कि वह हमेशा खुश रहता था। वह हर दिन सूर्योदय के समय तालाब के किनारे बैठकर अपनी शांति का आनंद लेता।

एक दिन, जंगल के रास्ते से एक तेज़ दौड़ने वाला खरगोश गुज़र रहा था। उसने कछुए को देखा और मजाक करते हुए बोला, "तुम तो बहुत धीमे हो, तुमसे तेज़ दौड़ने के लिए मुझे दौड़ने का कोई मतलब नहीं लगता! अगर मैं तुम्हारी तरह धीरे-धीरे चलता, तो मैं कभी मंज़िल तक नहीं पहुँचता!"

कम्बुग्रीव ने खरगोश की बातों पर ध्यान नहीं दिया और शांतिपूर्वक कहा, "शायद तुम तेज दौड़ने में सक्षम हो, लेकिन मेरी धीमी चाल में भी एक खास बात है। मैं हमेशा अपने रास्ते का आनंद लेता हूं, जबकि तुम जल्दबाजी में सब कुछ खो सकते हो।"

खरगोश ने कछुए का मजाक उड़ाया और कहा, "क्या तुम मेरी तरह तेज़ दौड़ने की कोशिश करना चाहते हो? मैं तुम्हें चुनौती देता हूं! एक दौड़ में भाग लो, और देखो कौन जीतता है!"

कम्बुग्रीव ने थोड़ी देर सोचा और फिर हंसी के साथ कहा, "ठीक है, मैं तुमसे दौड़ने की चुनौती स्वीकार करता हूँ।"

अगले दिन दौड़ की शुरुआत हुई। खरगोश अपनी तेज़ दौड़ से पहले ही कछुए से बहुत आगे बढ़ गया। कछुआ धीरे-धीरे अपनी राह पर चलता रहा, बिना किसी जल्दबाजी के। खरगोश ने बहुत दूर तक दौड़ने के बाद सोचा, "मैं तो बहुत तेज़ दौड़ रहा हूँ, कछुआ तो बहुत पीछे है, मुझे थोड़ी देर आराम करना चाहिए।" और वह एक पेड़ के नीचे आराम करने के लिए लेट गया।

कछुआ अपनी धीमी चाल में लगातार चलता रहा, और अंत में वह उस स्थान तक पहुँच गया जहाँ खरगोश आराम कर रहा था। कछुए ने बिना रुके अपनी राह जारी रखी और अंत में रेखा पार करते हुए जीत गया। खरगोश जब उठा तो उसे देखा कि कछुआ पहले ही जीत चुका था।

खरगोश शर्मिंदा होकर बोला, "मैंने समझा ही नहीं कि आलस्य और जल्दबाजी में कितना फर्क है।"

कम्बुग्रीव हंसते हुए बोला, "कभी-कभी, धीमी और स्थिर गति से ही सफलता मिलती है।"

सिख: धैर्य और लगातार प्रयास से हम किसी भी चुनौती को पार कर सकते हैं, जबकि जल्दबाजी कभी-कभी हमारी हार का कारण बनती है।

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