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बहुत समय पहले की बात है। एक राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गए। शिकार के पीछे भागते-भागते राजा अपने सैनिकों और रास्ते से भटक गए। जंगल घना था और अंधेरा धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था। भटकते-भटकते उन्हें रात हो गई।
राजा चिंतित थे, लेकिन तभी दूर एक जगह उन्हें एक झोपड़ी से रोशनी आती दिखाई दी। राहत की सांस लेते हुए वे उस ओर चल पड़े। जब वे झोपड़ी के पास पहुंचे तो देखा कि वह एक साधारण किसान की झोपड़ी थी। राजा ने दरवाजा खटखटाया।
किसान ने दरवाजा खोला और राजा को देखकर कहा, "आप कौन हैं और इतनी रात में यहां क्या कर रहे हैं?"
राजा ने विनम्रता से कहा, "मैं रास्ता भटक गया हूं। क्या मैं यहां रात बिताने की अनुमति पा सकता हूं?"
किसान ने राजा को अंदर बुलाया और कहा, "यह झोपड़ी बहुत साधारण है, और मैं गरीब हूं। लेकिन जो कुछ भी है, वह आपका है।"
राजा ने किसान की विनम्रता को सराहा और रात के लिए वहीं रुक गए। किसान ने राजा को अपने हिस्से का खाना खिलाया और खुद भूखा सो गया।
अगले दिन सुबह राजा ने जाने से पहले किसान से पूछा, "तुमने बिना मुझे पहचाने इतनी सहायता की। तुम्हें मुझसे कुछ चाहिए?"
किसान मुस्कुराते हुए बोला, "मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं भगवान का दिया हुआ जो भी है, उसी में खुश हूं। लेकिन हां, आप जब भी इस जंगल से गुजरें, मुझे याद जरूर करें।"
राजा किसान की विनम्रता और संतोष से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी पहचान नहीं बताई और चुपचाप चले गए।
कुछ दिनों बाद राजा ने किसान को अपने महल में बुलवाया। जब किसान महल पहुंचा, तो वह यह देखकर चकित रह गया कि वही यात्री जो उसकी झोपड़ी में रात को रुका था, वास्तव में राजा था।
राजा ने किसान को अपने राज्य का सम्मानित नागरिक घोषित किया और उसे बहुत सारी जमीन और धन दिया। लेकिन किसान ने विनम्रता से कहा, "महाराज, मुझे केवल उतना ही चाहिए, जितना मेरे परिवार के लिए पर्याप्त हो। बाकी धन आप उन लोगों में बांट दें, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।"
राजा ने किसान के इस उत्तर को सुनकर उसे अपने राज्य का सलाहकार बना दिया। वह किसान की सरलता और निस्वार्थता से प्रेरित होकर अपने राज्य में लोगों की भलाई के लिए और भी अच्छे काम करने लगे।
इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा सुख संतोष और निस्वार्थ सेवा में है।
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