एक बार एक सेवक ने भगवान से कहा, "हे प्रभु! आप एक ही स्थान पर खड़े-खड़े थक गए होंगे। मैं आपकी स्थिति समझ सकता हूं। यदि आप चाहें तो एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बनकर खड़ा हो जाता हूं, और आप मेरा रूप धारण करके संसार में घूम आइए।"
भगवान मुस्कराए और बोले, "यह बड़ा अनोखा प्रस्ताव है। परंतु इसमें तुम्हें बड़ी सावधानी रखनी होगी। मूर्ति बनकर खड़े होना आसान नहीं है।"
सेवक ने उत्साहपूर्वक कहा, "हे प्रभु, मुझे आपकी सेवा करने में आनंद मिलेगा। मैं हर हाल में आपकी बात मानूंगा।"
भगवान ने सेवक की निष्ठा को देखकर सहमति दे दी। उन्होंने सेवक को अपनी जगह मूर्ति बना दिया और स्वयं सेवक का रूप लेकर संसार में घूमने निकल पड़े।
मूर्ति के रूप में सेवक को भगवान ने एक शर्त दी, "तुम्हें केवल खड़े रहना है और जो भी भक्त आए, उसे आशीर्वाद देना है। परंतु किसी भी परिस्थिति में बोलना नहीं है। चाहे कुछ भी हो जाए, शांति बनाए रखना।"
सेवक ने सहर्ष शर्त स्वीकार कर ली।
भक्त आते गए, अपने-अपने मनोकामनाएं भगवान के चरणों में रखकर चले गए। सेवक को यह सब देखकर बड़ा आनंद हुआ। लेकिन थोड़ी देर बाद, एक व्यापारी आया। उसने भगवान के चरणों में एक थैला सोने के सिक्कों का चढ़ाया और प्रार्थना की, "हे प्रभु, मेरी व्यापार यात्रा सफल हो, और यह धन मेरी रक्षा करे।"
जैसे ही व्यापारी ने सिर झुका कर प्रणाम किया, पीछे से एक चोर आया और उस थैले को चुपचाप उठा लिया। सेवक यह देखकर बेचैन हो गया। उसने सोचा, "यदि मैं अब चुप रहा, तो भगवान का नाम बदनाम हो जाएगा। कोई भी यह विश्वास नहीं करेगा कि भगवान ने इस चोरी को होते देखा और कुछ नहीं किया।"
सेवक ने तुरंत बोलकर चोर को रोक लिया, "रुको! यह धन वापस रख दो।" चोर भयभीत होकर धन छोड़कर भाग गया। व्यापारी ने यह सब देखा और प्रसन्न होकर सेवक को धन्यवाद दिया।
शाम को भगवान वापस लौटे। उन्होंने सेवक से कहा, "तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया। मैंने तुम्हें किसी भी परिस्थिति में बोलने से मना किया था।"
सेवक ने कहा, "हे प्रभु, मैं चुप नहीं रह सका। यदि मैं नहीं बोलता, तो आपकी छवि खराब हो जाती।"
भगवान मुस्कुराए और बोले, "तुमने चुप रहने का महत्व नहीं समझा। वह चोर उसी धन से अपने जीवन का उद्धार करता। और व्यापारी का अहंकार उसी धन के कारण टूटता। लेकिन तुमने हस्तक्षेप करके इस संसार के संतुलन को बिगाड़ दिया। हर घटना का एक कारण होता है, जिसे हम समझ नहीं पाते।"
सेवक ने सिर झुका लिया और अपनी गलती स्वीकार की। उसने सीखा कि भगवान की हर लीला का अपना अर्थ होता है, और हमें उनकी योजना पर भरोसा रखना चाहिए।google.com, pub-9937615590363233, DIRECT, f08c47fec0942fa0
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