एक बार की बात है, एक राजा शिकार के बड़े शौकीन थे। एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे शिकार के लिए जंगल में जाएंगे। अपनी पसंदीदा तलवार और धनुष-बाण लेकर राजा जंगल की ओर निकल पड़े। उनके साथ उनके कुछ सैनिक भी थे, लेकिन राजा को शिकार का मजा अकेले लेना पसंद था।
जंगल में पहुँचकर उन्होंने एक सुंदर हिरण को देखा। हिरण बहुत चंचल था और हरे-भरे मैदान में दौड़ रहा था। राजा ने अपने घोड़े को दौड़ाया और हिरण का पीछा करने लगे। हिरण तेज दौड़ रहा था और राजा भी हार मानने वालों में से नहीं थे।
भागते-भागते राजा हिरण का पीछा करते-करते जंगल के गहरे हिस्से में पहुँच गए। वहाँ चारों ओर सन्नाटा था और सूरज की रोशनी भी पेड़ों के घने पत्तों के कारण मुश्किल से पहुँच रही थी। राजा ने महसूस किया कि वे अपने सैनिकों और रास्ते से भटक चुके हैं।
थोड़ी देर बाद राजा को प्यास लगने लगी। उन्होंने आसपास देखा, तो एक झरना बहता हुआ दिखाई दिया। राजा ने झरने का ठंडा पानी पिया और कुछ देर आराम करने का निर्णय लिया। तभी उन्हें झाड़ियों से सरसराहट की आवाज सुनाई दी। राजा सतर्क हो गए और अपने धनुष को संभाल लिया।
झाड़ियों से वही हिरण बाहर निकला, जिसका पीछा करते-करते राजा यहाँ तक आ पहुँचे थे। लेकिन इस बार हिरण डर के बजाय शांत और मित्रवत नजर आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह राजा को कुछ दिखाना चाहता हो। राजा ने हिरण का इशारा समझा और उसके पीछे चल पड़े।
हिरण राजा को जंगल के बाहर एक साफ रास्ते तक ले गया। राजा ने राहत की साँस ली और हिरण को धन्यवाद देते हुए कहा, "तुमने आज मेरी जान बचाई। मैं तुम्हें मारने आया था, लेकिन अब मैं शपथ लेता हूँ कि तुम्हें या तुम्हारे किसी साथी को कभी नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।"
हिरण ने जैसे राजा की बात समझ ली हो। वह एक बार अपनी पूँछ हिलाकर जंगल में गायब हो गया। राजा ने उस दिन से शिकार करना छोड़ दिया और प्रजा की भलाई में अपना ध्यान लगाने का वादा किया।
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दया और करुणा में बड़ी शक्ति होती है। प्रकृति और जीवों का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
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