एक बार की बात है, एक केकड़ा समुद्र के किनारे अपनी मस्ती में टेढ़ा-मेढ़ा चलता जा रहा था। वह हर कुछ कदम पर रुकता और पीछे मुड़कर अपने पैरों के निशानों को देखता। उसे अपने टेढ़े-मेढ़े निशानों पर हंसी आती, और वह सोचता, "ये निशान मेरी पहचान हैं, ये दिखाते हैं कि मैं अपनी ही राह पर चलता हूं।"
चलते-चलते, उसने देखा कि एक बड़ा सा समुद्री लहर उसकी तरफ तेजी से बढ़ रही है। वह घबरा गया और जल्दी-जल्दी भागने लगा। लेकिन जैसे ही वह भागा, लहर ने उसके पीछे छोड़े गए निशानों को मिटा दिया। केकड़ा दुखी होकर रुक गया और सोचने लगा, "मेरे सारे निशान मिट गए। मेरी पहचान अब कहाँ गई?"
उसी समय, पास में एक बूढ़ा कछुआ बैठा था। उसने केकड़े को उदास देखा और पास आकर पूछा, "क्यों दुखी हो, बेटे?"
केकड़े ने कहा, "मेरी सारी मेहनत और पहचान समुद्र की लहरों ने मिटा दी। अब मैं क्या करूं?"
कछुए ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, यह तो जीवन का नियम है। हम जो भी निशान छोड़ते हैं, समय और परिस्थितियाँ उन्हें मिटा देती हैं। असली पहचान हमारी चाल में है, हमारे सफर में है, न कि उन निशानों में। इसलिए, पीछे मुड़कर मत देखो। आगे बढ़ो और जीवन का आनंद लो।"
यह सुनकर केकड़े को समझ आया कि वह बेवजह अपने निशानों को लेकर परेशान हो रहा था। उसने तय किया कि अब वह अपनी चाल और सफर का आनंद लेगा, न कि पीछे छूटे निशानों का।
सीख:
जीवन में अपने प्रयास और सफर का आनंद लें। पीछे छूटे निशानों पर मत रुकें, क्योंकि असली पहचान हमारी यात्रा में होती है, न कि उन निशानों में।
google.com, pub-9937615590363233, DIRECT, f08c47fec0942fa0
0 Comments