भगवान् विष्णु और पृथ्वी की कथा


बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म और सत्य की जगह अधर्म और अत्याचार का बोलबाला हो गया था। राक्षसों और दुष्ट लोगों ने पृथ्वी पर इतना अत्याचार किया कि वह सहन नहीं कर पाई। हर तरफ हिंसा, अन्याय और पाप का राज था। निर्दोष लोग पीड़ित हो रहे थे, और पृथ्वी का संतुलन बिगड़ता जा रहा था।

पृथ्वी माता बहुत दुखी थीं। अपने दुःख और व्यथा को लेकर वे भगवान विष्णु के पास गईं। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हुए कहा, "हे भगवान! आपने मुझे जीवों का पालन-पोषण करने के लिए बनाया था, परंतु अब स्थिति ऐसी हो गई है कि मैं स्वयं पीड़ा में हूं। राक्षस और दुष्ट लोग मेरे संसाधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं और मेरे बच्चों (जीव-जंतुओं) को कष्ट दे रहे हैं। कृपया इस स्थिति का समाधान करें।"

भगवान विष्णु ने पृथ्वी माता की व्यथा सुनी और उन्हें धीरज बंधाया। उन्होंने कहा, "धैर्य रखो, हे पृथ्वी। मैं स्वयं इस अधर्म और अत्याचार को समाप्त करने के लिए अवतार लूंगा। जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है, तब-तब मैं न्याय और धर्म की स्थापना के लिए प्रकट होता हूं।"

इसके बाद भगवान विष्णु ने धरती पर एक अवतार लिया। उन्होंने उन सभी राक्षसों और दुष्ट लोगों का संहार किया, जो पृथ्वी पर अत्याचार कर रहे थे। उन्होंने धर्म की स्थापना की और पृथ्वी को उसकी पुरानी शांति और सुंदरता लौटाई।

पृथ्वी माता ने भगवान विष्णु का धन्यवाद किया और आशीर्वाद दिया कि वे सदा धर्म और न्याय की रक्षा करते रहें। इस प्रकार, भगवान विष्णु के अवतार ने पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करके सभी जीवों को सुख और शांति का संदेश दिया।

यह कथा हमें सिखाती है कि जब भी अन्याय और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में प्रकट होकर धर्म और सत्य की रक्षा करते हैं।


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