एक समय की बात है, भगवान विष्णु अपने दिव्य सिंहासन पर विराजमान थे। उस दिन उन्होंने सभी जीवों को बुलाया और उन्हें कुछ न कुछ भेंट देने का निश्चय किया। एक-एक कर सभी जीव उनके पास आए। भगवान विष्णु ने उनकी आवश्यकता और स्वभाव के अनुसार हर एक को कुछ न कुछ दिया।
कोई पक्षी आया तो उसे सुंदर पंख मिले, कोई मछली आई तो उसे जल में आसानी से तैरने का गुण मिला। हिरण को तेज दौड़ने की शक्ति दी, शेर को साहस और बल। इस प्रकार सभी जीव अपनी भेंट स्वीकार कर प्रसन्नता से अपने-अपने स्थान पर लौट गए।
जब अंतिम जीव भी चला गया, तो देवी लक्ष्मी, जो श्री हरि के पास खड़ी यह सब देख रही थीं, मुस्कुराते हुए बोलीं,
"हे नाथ, मैंने देखा कि आपने सभी जीवों को कुछ न कुछ दिया। सब कुछ इतनी उदारता से वितरित किया, लेकिन मैंने यह नहीं देखा कि आपने स्वयं को क्या दिया। आप अपने लिए कुछ क्यों नहीं रखते?"
भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले,
"हे देवी, जब मैंने सभी जीवों को भेंट दी, तो मैं ही उनके रूप में उन्हें वह सब कुछ दे रहा था। इस सृष्टि में कुछ भी मेरा अलग नहीं है। जब हर जीव मुझसे कुछ पाता है, तो वह मेरे ही एक अंश को प्राप्त कर रहा है। इसलिए मैं पहले से ही सब कुछ हूं। मुझे अलग से कुछ देने की आवश्यकता नहीं।"
यह सुनकर लक्ष्मीजी ने फिर पूछा,
"लेकिन, प्रभु, जब सभी जीव आपको भेंट देने आएंगे, तो आप क्या स्वीकार करेंगे?"
इस पर भगवान विष्णु ने उत्तर दिया,
"जब भी कोई मुझे सच्चे प्रेम, भक्ति और समर्पण से कुछ देगा, मैं उसे स्वीकार करूंगा। मेरा सर्वस्व भक्तों के प्रेम में समाहित है। भक्ति ही मेरी सबसे बड़ी भेंट है।"
यह उत्तर सुनकर लक्ष्मीजी प्रसन्न हो गईं और बोलीं,
"हे नाथ, आपकी यह भावना ही आपको जगत का पालनकर्ता बनाती है। यही कारण है कि सभी जीव आपको प्रेम और श्रद्धा से पूजते हैं।"
इस प्रकार, भगवान विष्णु ने यह संदेश दिया कि सबसे महत्वपूर्ण भेंट प्रेम और भक्ति है। वही उनकी सच्ची प्रसन्नता का कारण है।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि भक्ति, समर्पण और सच्चा प्रेम ही भगवान को पाने का मार्ग है।
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