मूर्ख मित्र और राजा


एक राजा के पास एक वफादार मगर मूर्ख सेवक था। राजा उस सेवक पर बहुत भरोसा करता था और उसे हमेशा अपने साथ रखता था। राजा ने कई बार उससे कहा, "तुमसे अच्छा और वफादार कोई नहीं। तुम मेरे सच्चे मित्र हो।"

एक दिन राजा बगीचे में आराम कर रहा था। उसके चारों ओर हरियाली और फूल खिले हुए थे। थोड़ी देर में राजा को नींद आ गई। सेवक ने देखा कि एक मक्खी बार-बार राजा के चेहरे पर बैठ रही है। उसने सोचा, "यह मक्खी राजा की नींद खराब कर रही है। मुझे इसे भगाना चाहिए।"

सेवक ने पहले हाथ से मक्खी को भगाने की कोशिश की, लेकिन मक्खी बार-बार वापस आ जाती। उसने गुस्से में पास पड़ा एक बड़ा पत्थर उठाया और जैसे ही मक्खी राजा की नाक पर बैठी, उसने पूरी ताकत से पत्थर फेंक दिया।

मक्खी तो तुरंत उड़ गई, लेकिन पत्थर सीधे राजा की नाक पर लगा और राजा गंभीर रूप से घायल हो गया। राजा दर्द से कराहते हुए उठा और सेवक की मूर्खता पर बहुत गुस्सा हुआ।

शिक्षा:

मूर्ख मित्र से बेहतर है कि दुश्मन हो, क्योंकि मूर्ख मित्र अनजाने में नुकसान पहुंचा सकता है।

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