एक बार एक आदमी महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा और बड़े दुखी मन से पूछा, "प्रभु, मुझे यह जीवन क्यों मिला? इस विशाल दुनिया में मेरी क्या कीमत है? क्या मैं भी किसी काम का हूं?"
बुद्ध ने उसकी बात सुनी और थोड़ी देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने एक चमकीला पत्थर उठाया और वह आदमी को दिया। वह बोले, "इस पत्थर को तुम एक दिन के लिए गांव में ले जाओ। जहां भी तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इसे खरीदने के लिए तैयार हो, तो उसे बेच दो। अगर कोई इसे खरीदने के लिए न कहे, तो वापस ले आना।"
आदमी यह सुनकर हैरान हुआ, लेकिन उसने बुद्ध की बात मानी और उस पत्थर को लेकर गांव की ओर चल पड़ा। पहले उसने गांव के बाजार में कई दुकानदारों से पूछा, लेकिन किसी ने भी उस पत्थर को खरीदने की इच्छा नहीं जताई। निराश होकर वह जंगल की ओर बढ़ा। वहां उसने एक बड़़ी लकड़हारा से पूछा, "क्या आप यह पत्थर खरीदेंगे?"
लकड़हारा ने उत्तर दिया, "मैं इसके लिए कुछ भी नहीं दूंगा, लेकिन अगर तुम इसे जंगल के राजा के पास ले जाओ तो शायद वह इसे ले लें।"
आदमी अब राजा के पास गया। राजा ने पत्थर को देखा और कहा, "यह तो बहुत ही सुंदर है। मैं इसे खरीदने के बजाय इसे अपने महल में सजाने के लिए ले लूंगा।"
आदमी पत्थर लेकर महल पहुंचा, लेकिन महल के दरबान ने कहा, "यह तो हमारे लिए बहुत ही कीमती है, आप इसे राजा को दे सकते हैं, लेकिन इसके बदले में आपको बहुत अच्छा इनाम मिलेगा।"
आदमी यह सब सुनकर फिर बुद्ध के पास वापस लौटा। बुद्ध ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा, "क्या तुमने कोई कीमत पाई?"
आदमी ने उत्तर दिया, "हाँ प्रभु, मैंने पाया कि इस पत्थर की कीमत हर किसी के लिए अलग-अलग थी। कुछ इसे बहुत मामूली मानते थे, जबकि कुछ ने इसकी बहुत क़ीमत समझी।"
बुद्ध ने कहा, "तुम्हारी तरह ही जीवन का मूल्य भी अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होता है। इस दुनिया में तुम्हारी कीमत का निर्धारण तुम नहीं, बल्कि तुमसे जुड़ी हुई परिस्थितियां और लोग करते हैं। लेकिन सच्चे मूल्य का एहसास तब होता है जब तुम अपने जीवन का उद्देश्य पहचान सको और अपने अस्तित्व के उद्देश्य को समझ सको।"
आदमी समझ गया कि जीवन का मूल्य परिस्थितियों और समाज के नजरिए से नहीं, बल्कि अपने आत्मा और उद्देश्य को समझने से है।
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