हाथी ने तोड़ा यमराज का घमंड

एक समय की बात है। एक सुंदर, बलशाली और परोपकारी हाथी जंगल में रहता था। वह सभी जीवों की मदद करता और अपनी शक्ति का उपयोग केवल अच्छाई के लिए करता था। लेकिन, एक दिन हाथी की मृत्यु हो गई। उसकी आत्मा यमलोक पहुंची, जहां उसके कर्मों का लेखा-जोखा निकाला जाने लगा।

यमराज के दरबार में चित्रगुप्त ने हाथी के कर्मों का हिसाब पढ़ना शुरू किया। चित्रगुप्त बोले, "हाथी ने अपने जीवन में बहुत परोपकार किया है, लेकिन एक बार उसने क्रोध में आकर एक छोटे पेड़ को उखाड़ दिया था। इसलिए इसे नरक जाना होगा।"

यह सुनकर हाथी की आत्मा आश्चर्यचकित रह गई। उसने यमराज से विनम्रता से कहा, "महाराज, मैंने जीवनभर परोपकार किया। मैंने कई जीवों को शिकारियों से बचाया, भूखों को फल खिलाए और प्यासों को पानी पिलाया। क्या एक भूल के लिए मुझे नरक जाना चाहिए?"

यमराज ने गर्व से उत्तर दिया, "नियम सभी के लिए समान हैं। एक बार पाप किया है, तो नरक जाना ही होगा।"

हाथी की आत्मा ने शांत स्वर में कहा, "यदि यह न्याय है, तो मुझे इसे स्वीकार है। लेकिन मैं आपसे एक अनुरोध करना चाहता हूं। कृपया मुझे मेरे कर्मों का लेखा-जोखा देखने दीजिए।"

यमराज ने अनुमति दी। हाथी ने अपने अच्छे कर्मों और बुरे कर्मों की सूची देखी। उसने देखा कि उसके अच्छे कर्मों का पलड़ा भारी था। उसने यमराज से कहा, "महाराज, यदि न्याय का नियम यह है कि अच्छे कर्मों का फल बुरे कर्मों से अधिक हो, तो मुझे स्वर्ग में जाना चाहिए।"

यह सुनकर यमराज को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने सोचा, "कहीं न कहीं, मैं अपने अधिकार का घमंड कर रहा था। हाथी ने मुझे यह समझाया कि न्याय हमेशा निष्पक्ष होना चाहिए।"

यमराज ने हाथी को स्वर्ग भेजने का आदेश दिया और अपने दरबार में घोषणा की कि भविष्य में न्याय पूरी निष्पक्षता और संतुलन से किया जाएगा।

इस प्रकार, हाथी की विनम्रता और बुद्धिमानी ने न केवल उसका उद्धार किया, बल्कि यमराज को भी सच्चा न्याय करने का मार्ग दिखाया।
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