एक समय की बात है, एक छोटे से गांव में मोहन नामक एक गरीब लकड़हारा अपने परिवार के साथ रहता था। मोहन की पत्नी, रानी, बहुत मेहनती और समझदार थी। वे दोनों अपनी कठिन मेहनत से बमुश्किल अपने घर का खर्च चलाते थे। मोहन दिनभर जंगल में लकड़ियां काटता, और रानी घर का काम करती। बावजूद इसके, वे हमेशा खुश रहते और एक-दूसरे का साथ निभाते।
एक दिन, मोहन जंगल में लकड़ियां काटते हुए एक पुराने और रहस्यमय कुएं के पास पहुँचा। कुआं बहुत गहरा था और उसकी सतह पर कुछ चमकते हुए पत्थर थे। मोहन ने कुएं के पास जाकर देखा और सोचा, "यह कुआं कितना अजीब है। शायद यहाँ से कुछ विशेष मिल सकता है।"
वह कुएं के पास झुका और उसकी गहराई में झांकने लगा। तभी उसने सुनी एक आवाज, "तुमने मुझे देखा है, तो मुझे तुम्हारी मदद करनी होगी। मैं एक जादुई कुआं हूँ, और जो भी मुझे देखेगा, उसकी तीन इच्छाएं पूरी होंगी।"
मोहन चौंका, लेकिन उसने सोचा कि यह कोई सपना होगा। फिर भी, उसने अपनी पहली इच्छा रखी, "मेरे पास इतना पैसा हो कि मैं और मेरी पत्नी कभी भी भूखे न रहें।"
कुआं थोड़ी देर तक चुप रहा, फिर उसकी गहराई से एक सोने का सिक्का बाहर आकर मोहन के हाथ में गिरा। मोहन ने हैरान होकर सिक्का देखा और सोचा, "यह सचमुच हो रहा है।"
फिर उसने अपनी दूसरी इच्छा रखी, "मेरे परिवार के लिए एक बड़ा घर हो, ताकि हम आराम से रह सकें।"
तभी कुएं से एक विशाल और सुंदर घर उभर आया, जो मोहन और रानी के लिए एक आदर्श घर बन गया।
अब मोहन के पास एक आखिरी इच्छा बची थी। उसने सोचा, "मेरे पास सब कुछ है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि हम कभी भी दुखी न हों और हमेशा खुश रहें।"
कुआं ने उसकी तीसरी इच्छा भी पूरी की। मोहन और रानी का जीवन अब सुखमय हो गया। वे कभी भी दुःख और कष्ट का सामना नहीं करते थे और उनका घर हमेशा खुशहाल रहता था।
लेकिन एक दिन, मोहन ने महसूस किया कि जो खुशियाँ उसने और उसकी पत्नी ने हासिल की हैं, वे सही मायने में सुख नहीं ला रही हैं। सोने के सिक्के और बड़ा घर सब कुछ था, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और ईमानदारी की राह छोड़ दी थी।
मोहन ने फिर से उसी कुएं के पास जाकर कहा, "मैंने जो कुछ भी प्राप्त किया है, वह सब तुम्हारी कृपा से है। लेकिन मुझे अपनी मेहनत की कीमत पर यह सब नहीं चाहिए। मैं चाहता हूँ कि मेरी इच्छाओं को वापस किया जाए, ताकि मैं फिर से अपनी मेहनत से खुशियाँ पा सकूँ।"
कुआं ने उसकी बात सुनी और उसकी इच्छाओं को वापस ले लिया। मोहन और रानी फिर से अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आए, लेकिन अब वे ज्यादा खुश थे, क्योंकि उन्होंने समझा था कि सच्ची खुशी मेहनत और ईमानदारी में ही है।
कहानी का संदेश है कि असली सुख किसी जादुई चीज में नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और संतोष में है।
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