एक समय की बात है, जब एक शक्तिशाली राजा ऋतध्वज अपनी दिव्य मणि के लिए प्रसिद्ध था। इस मणि में असाधारण शक्तियाँ थीं। ऐसा कहा जाता था कि यह मणि जिसके पास हो, उसके राज्य में सुख-समृद्धि और शत्रुओं से सुरक्षा बनी रहती है। राजा ऋतध्वज ने मणि को बड़ी सावधानी से अपने पास रखा था।
लेकिन शत्रु राजा शत्रुजित् इस मणि को प्राप्त करने के लिए हमेशा योजनाएँ बनाता रहता था। वह जानता था कि मणि को सीधे छीनना असंभव है, क्योंकि ऋतध्वज का राज्य और उसकी सुरक्षा बहुत मजबूत थी। इसीलिए उसने चतुराई और छल का सहारा लेने का निश्चय किया।
एक दिन, शत्रुजित् ने अपने सबसे विश्वासपात्र सेवक को बुलाया और उसे ब्राह्मण का रूप धारण करने का आदेश दिया। सेवक ने ऋषि का वेश धारण किया और सीधे ऋतध्वज के महल की ओर निकल पड़ा। वहाँ पहुँचकर उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं एक तपस्वी ब्राह्मण हूँ और वर्षों से कठिन तपस्या कर रहा हूँ। मैंने सुना है कि आपकी मणि अत्यंत दिव्य और शक्तिशाली है। यदि आप मुझे कुछ समय के लिए यह मणि दे दें, तो मैं इससे अपने यज्ञ को पूर्ण कर सकता हूँ। यह आपके राज्य और सभी प्राणियों के लिए भी कल्याणकारी होगा।"
ऋतध्वज एक धर्मपरायण राजा थे और उन्होंने ब्राह्मण के वेश में आए छलिया पर विश्वास कर लिया। उन्होंने बिना सोचे-समझे मणि ब्राह्मण को सौंप दी।
जैसे ही वह मणि लेकर महल से बाहर निकला, उसने तुरंत अपना वेश बदला और शत्रुजित् के पास पहुँच गया। मणि को सौंपते हुए उसने कहा, "महाराज, आपकी योजना सफल हुई। अब यह मणि आपके पास है।" शत्रुजित् बहुत प्रसन्न हुआ और उस छलिया को इनाम देकर अपने दरबार में सम्मानित किया।
जब ऋतध्वज को इस धोखे का पता चला, तो वह अत्यंत दुखी और क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी सेना को तैयार किया और शत्रुजित् पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में ऋतध्वज ने अपनी वीरता और चतुराई से न केवल अपनी मणि वापस पाई, बल्कि शत्रुजित् को हराकर उसके राज्य को भी अपने अधिकार में ले लिया।
यह कहानी सिखाती है कि छल और धोखा भले ही कुछ समय के लिए सफल हो जाए, लेकिन सत्य और धर्म की विजय अंततः निश्चित होती है।
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