एक ब्राह्मण रात्रि में अपने घर के बाहर बैठा था। तभी एक स्त्री सामने से गुजरी और ब्राह्मण ने उसे रोककर पूछा, "आप कौन हैं देवी ? इस घोर रात्रि में कहां जा रही हैं?"
स्त्री बोली, "मैं लक्ष्मी हूं। इस नगर को छोड़कर जा रही हूं।" "ठीक है, जाओ" ब्राह्मण बोला।
कुछ देर बाद एक अन्य स्त्री के निकलने पर ब्राह्मण ने उससे वही प्रश्न किया। जिसके उत्तर में वह बोली, "मैं कीर्ति हूं और यहां से जा रही हूं।"
ब्राह्मण ने कहा, "शौक से जाओ।"
इसके बाद उसने एक पुरुष को आते देखा, तो उठकर उससे मार्ग
में वही बात पूछी।
पुरुष बोला, "मैं सत्य हूं और इस नगर को छोड़कर जा रहा हूं।"
यह सुनकर ब्राह्मण चिंतित हो उठा और लपककर सत्य के चरणों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाकर कहने लगा, "नहीं भगवन! आप यहां से न जाएं, आपके जाने के बाद तो यहां कुछ भी नहीं बचेगा, मैं आपको यहां से नहीं जाने दूंगा, भले ही मेरे प्राण निकल जाएं।"
परोपकारी ब्राह्मण की अनुनय विनय पर सत्य ने वहां रुकने की स्वीकृति दे दी। ब्राह्मण को संतोष हो गया। कुछ ही क्षणों में लक्ष्मी और कीर्ति को वापस आते देखकर वह मुस्कराया और बोला, "आप दोनों तो चली गई थीं। अब क्या हुआ?"
यह सुनकर वे बोलीं, "हे ब्राह्मण देव! जहां पर सत्य है, वहां से हम कभी नहीं जा सकतीं। अब हमें यहीं रहना है|🌹🌹🌹🌹
<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
crossorigin="anonymous"></script>
0 Comments