एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर कैलाश पर्वत पहुँचे। द्वार पर गरुड़ को छोड़कर श्रीहरि स्वयं महादेव शिव से मिलने अंतःपुर में चले गए।
कैलाश पर्वत की अलौकिक प्राकृतिक शोभा देखकर गरुड़ मंत्रमुग्ध हो गए। चारों ओर बर्फ से ढकी पर्वत-श्रृंखलाएँ, मंद शीतल वायु, देवदार के वृक्ष और दिव्य शांति—सब कुछ अद्भुत था। तभी उनकी दृष्टि एक विचित्र दृश्य पर पड़ी।
गरुड़ ने देखा कि कैलाश के एक कोने में एक सर्प अत्यंत व्याकुल अवस्था में पड़ा हुआ है। वह बार-बार आकाश की ओर देख रहा था, मानो किसी अनहोनी की प्रतीक्षा कर रहा हो। गरुड़ ने पास जाकर पूछा—
“हे नाग! तुम इतने भयभीत क्यों हो?”
नाग ने कांपती हुई आवाज़ में कहा—
“हे गरुड़! आज मेरी मृत्यु निश्चित है। ब्रह्मा जी की लिखी मेरी आयु समाप्त हो चुकी है। आज ही काल मुझे ले जाएगा।”
गरुड़ यह सुनकर चौंक पड़े। उन्होंने सोचा— मैं तो पक्षिराज हूँ, मेरी गति से तेज़ कोई नहीं। यदि इस नाग को बहुत दूर पहुँचा दिया जाए तो शायद इसकी मृत्यु टल जाए।
गरुड़ ने नाग से कहा—
“डरो मत। मैं तुम्हें ऐसी जगह पहुँचा दूँगा जहाँ काल भी न पहुँच सके।”
यह कहकर गरुड़ ने नाग को अपने पंखों में लपेट लिया और आकाश में ऊँची उड़ान भर ली। वे सात समुद्र पार कर गए, पर्वतों को लांघते हुए एक निर्जन द्वीप पर पहुँचे और नाग को वहीं छोड़ दिया।
गरुड़ बोले—<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"
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“अब तुम निश्चिंत रहो। यहाँ कोई तुम्हें नहीं ढूँढ पाएगा।”
इतना कहकर गरुड़ वापस कैलाश लौट आए। कुछ समय बाद भगवान विष्णु शिवजी से मिलकर बाहर आए। गरुड़ को देखते ही मुस्कराकर बोले—
“गरुड़! क्या तुमने आज किसी का भाग्य बदलने का प्रयास किया?”
गरुड़ सकुचाते हुए बोले—
“प्रभु, मैंने केवल एक नाग की रक्षा करने का प्रयास किया था, जिसकी मृत्यु आज निश्चित बताई गई थी।”
तब श्रीहरि ने गंभीर स्वर में कहा—
“गरुड़, विधि के लेख को कोई नहीं बदल सकता। आओ, मैं तुम्हें सत्य दिखाता हूँ।”
भगवान विष्णु ने दिव्य दृष्टि से दिखाया कि जिस निर्जन द्वीप पर गरुड़ ने नाग को छोड़ा था, वहीं एक शिला के नीचे पहले से ही एक चूहा रहता था। उसी चूहे ने नाग को काट लिया और उसी क्षण नाग की मृत्यु हो गई।
गरुड़ यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गए।
भगवान विष्णु ने कहा—
“देखो गरुड़, मृत्यु टालने से नहीं टलती। जब जिसका समय आता है, तो मृत्यु स्वयं मार्ग खोज लेती है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह भयभीत न हो, बल्कि धर्म, सत्य और कर्म के मार्ग पर चले।”
गरुड़ ने हाथ जोड़कर कहा—
“प्रभु, आज मुझे जीवन का सबसे बड़ा सत्य ज्ञात हो गया।”
कथा से शिक्षा
👉 विधि का विधान अटल है।
👉 मृत्यु को टाला नहीं जा सकता, पर जीवन को सार्थक अवश्य बनाया जा सकता है।
👉 इसलिए भय नहीं, धर्म और कर्म का पालन करें।
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