https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233एक समय की बात है। काशी नगरी में विद्याधर नाम का एक बहुत बड़ा विद्वान रहता था। उसे अपने ज्ञान पर अत्यधिक घमंड था। वह कहा करता—
“मेरे जैसा ज्ञानी पूरे संसार में कोई नहीं।”
एक दिन उसने घोषणा कर दी—
“यदि कोई मुझे शास्त्रार्थ में हरा दे, तो मैं उसे अपना गुरु मान लूँगा।”
🌿 कृष्ण की लीला
भगवान श्रीकृष्ण एक साधारण ग्वाले का वेश धारण कर सभा में पहुँचे। उनके हाथ में बाँसुरी थी और मुख पर मधुर मुस्कान।
विद्याधर ने हँसते हुए कहा—
“अरे ग्वाले! यहाँ विद्वानों की सभा है, तुम यहाँ क्या करोगे?”
कृष्ण मुस्कराकर बोले—
“ज्ञान उम्र या वेश से नहीं, समझ से पहचाना जाता है।”
📜 शास्त्रार्थ
शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ। श्रीकृष्ण ने ऐसे सरल प्रश्न पूछे कि विद्याधर उलझता चला गया। फिर कृष्ण ने गीता का एक श्लोक समझाते हुए कहा—
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233“जो ज्ञान अहंकार बढ़ाए, वह अज्ञान है।”
विद्याधर को अपने भीतर का घमंड दिखाई देने लगा। उसका सिर झुक गया।
🌟 सच्चा ज्ञान
तभी श्रीकृष्ण अपने विराट रूप में प्रकट हुए। सभा प्रकाश से भर गई। विद्याधर उनके चरणों में गिर पड़ा और बोला—
“प्रभु! आज मुझे सच्चा ज्ञान मिला।”
कृष्ण ने कहा—
“सच्चा विद्वान वही है, जो स्वयं को शिष्य मानता है।”
🌺 शिक्षा
👉 ज्ञान का उद्देश्य विनम्रता है, घमंड नहीं।
👉 जो झुकना सीख लेता है, वही ऊँचा उठता है
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