भक्त का आनंद (bhakt ka anand)

https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233एक गाँव में एक सरल-हृदय भक्त रहता था। उसके जीवन का एक ही संकल्प था—निरंतर भगवद् गीता का पाठ। सुख हो या दुख, ठंड हो या वर्षा, बीस वर्षों तक उसने एक भी दिन गीता-पाठ नहीं छोड़ा। न उसे यश की चाह थी, न किसी चमत्कार की अपेक्षा—बस श्रद्धा थी, प्रेम था और समर्पण था।
एक दिन भगवान ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। साक्षात प्रकट होकर बोले—
“अरे भक्त! तू यह मानता है कि तेरे गीता-पाठ से मैं प्रसन्न हूँ? यह तेरा वहम है। मैं तेरे पाठ से बिल्कुल भी खुश नहीं हुआ।”
ये शब्द सुनते ही भक्त की आँखों में आँसू नहीं आए, न उसका मन टूटा। उलटे वह आनंद से भर उठा। वह नाचने लगा, झूमने लगा, जैसे भीतर कोई दीपक जल उठा हो।
भगवान चकित होकर बोले—
“मैंने कहा कि मैं तेरे पाठ से खुश नहीं हूँ, फिर भी तू नाच क्यों रहा है?”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233भक्त ने हाथ जोड़कर विनम्रता से कहा—
“भगवन्! आप मेरे पाठ से खुश हों या न हों, यह मैं नहीं जानता। पर आज मुझे यह सौभाग्य तो मिला कि आपने मेरे पाठ को सुना। मेरी साधना आपकी करुणा तक पहुँची—बस इसी आनंद में मैं नाच रहा हूँ।”
भगवान मुस्कुराए। उनके नेत्रों में करुणा छलक आई। उन्होंने कहा—
“भक्त! यही सच्चा भक्त-भाव है। फल की अपेक्षा नहीं, प्रशंसा की चाह नहीं—केवल प्रेम और समर्पण। ऐसे ही भाव से की गई साधना ही मुझे प्रिय है।”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। और उस दिन भक्त समझ गया कि ईश्वर को पाने का मार्ग कर्म या वाणी नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम है।
संदेश:
भक्ति का मूल्य परिणाम में नहीं, भाव में है। जब साधना में अहंकार नहीं, अपेक्षा नहीं—तभी वह ईश्वर तक पहुँचती है।

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