श्रद्धा की परीक्षा


https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233 एक छोटे से गाँव में रामदास नाम का एक गरीब लेकिन अत्यंत श्रद्धालु व्यक्ति रहता था। उसके पास धन नहीं था, पर उसका हृदय भक्ति से भरा हुआ था। वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मंदिर जाता और भगवान विष्णु का नाम जप करता।
एक दिन गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। अनाज समाप्त होने लगा। रामदास के घर में भी खाने को कुछ नहीं बचा। फिर भी वह रोज़ मंदिर जाता और कहता—
“हे प्रभु, जो आप देंगे वही मेरे लिए पर्याप्त है।”
एक सुबह मंदिर जाते समय रास्ते में उसे एक भूखा साधु मिला। साधु ने कहा,
“वत्स, तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है।”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233 रामदास के पास घर में बचा हुआ आख़िरी मुट्ठी भर चावल था। पल भर सोचा, फिर बिना हिचकिचाए वह चावल साधु को दे दिए।
साधु ने मुस्कुराकर कहा—https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233
“वत्स, तुम्हारी परीक्षा पूर्ण हुई।”
इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गया। उसी क्षण आकाश से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और भगवान विष्णु की वाणी सुनाई दी—
“जो भक्त दूसरों के दुःख में अपने सुख का त्याग करता है, उसका जीवन कभी खाली नहीं रहता।”
उसी दिन से रामदास के जीवन की कठिनाइयाँ समाप्त होने लगीं। गाँव में वर्षा हुई, खेत हरे-भरे हो गए और रामदास का जीवन सादगी और संतोष का उदाहरण बन गया।
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