बहुत समय पहले महाराष्ट्र में एक युवक था जिसका नाम था पुंडलीक। वह शुरुआत में माता-पिता का अनादर करता था, मित्रों के साथ घूमता और मौज-मस्ती में जीवन बिताता था।
एक दिन जब वह एक संत के साथ तीर्थ यात्रा पर गया, वहां उसे एक संत ने कहा:
> "जो अपने माता-पिता की सेवा नहीं करता, उसकी कोई पूजा भी ईश्वर तक नहीं पहुँचती।"
🌿 परिवर्तन की शुरुआत:
पुंडलीक को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह तुरंत घर लौटा और अपने बूढ़े माता-पिता की तन-मन-धन से सेवा करने लगा। वह उनके पैर दबाता, खाना बनाता, दवा लाता – दिन-रात बस सेवा में लगा रहता।
🌟 ईश्वर का आगमन:
पुंडलीक की सेवा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं उसके घर आए — श्री विठोबा के रूप में।
लेकिन पुंडलीक उस समय अपने माता-पिता के पाँव दबा रहा था। उसने भगवान से कहा, "प्रभु! मैं अभी माता-पिता की सेवा कर रहा हूँ। कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा करें।"
यह कहकर उसने भगवान को ईंट पर खड़ा होने के लिए कहा।
भगवान मुस्कराए और उस ईंट पर खड़े होकर पुंडलीक के सेवा समाप्त होने का इंतज़ार करने लगे।
📿 भक्ति का पुरस्कार:
जब पुंडलीक सेवा समाप्त करके आया, भगवान ने उसे वरदान दिया:
> "तू सच्चा भक्त है। तेरी भक्ति और सेवा से मैं प्रसन्न हूँ। यहाँ एक मंदिर बनेगा और मैं सदा इसी रूप में खड़ा रहूँगा।"
आज भी पंढरपुर (महाराष्ट्र) में भगवान विठोबा उसी ईंट पर खड़े हैं, और करोड़ों भक्त वहाँ दर्शन करने जाते हैं।
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