https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233काफ़ी देर तक ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें एक बूढ़े साधु मिल गए। उन्होंने उन्हें बड़े विनम्र भाव से घर आमंत्रित किया और प्रेमपूर्वक बैठाकर पत्तल में भोजन परोसा।
जैसे ही भोजन सामने आया, वह साधु बिना किसी मंत्र या भोग के तुरंत भोजन करने लगे।
सज्जन चौंक गए और बोले, “महाराज! आपने भगवान को भोग तो लगाया ही नहीं!”
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233साधु ने भोजन करते हुए तटस्थ भाव से उत्तर दिया, “भगवान क्या होता है? तुम जैसे मूर्खों की कल्पना मात्र!”
यह सुनकर सज्जन क्रोधित हो उठे। उन्होंने साधु की पत्तल खींच ली और बोले, “अगर भगवान कुछ नहीं हैं, तो फिर तुम कौन हो? हम तो भगवान के नाते ही तुम्हें भोजन करा रहे थे!”
तभी आकाश से दिव्य वाणी गूंजी—
https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233“अरे! मेरी निंदा करते-करते यह साधु बूढ़ा हो गया, फिर भी मैं इसे भोजन देता रहा। और तू, जो मेरा भक्त कहलाता है, एक समय का भोजन भी नहीं दे सका! सोच, अगर मैं इसे अन्न न दूँ, तो यह कितने दिन जीवित रह सकेगा?”
आकाशवाणी सुनते ही उन सज्जन की आँखें खुल गईं। उन्हें अपनी गलती पर अत्यंत लज्जा हुई। उन्होंने तुरंत साधु से क्षमा मांगी और प्रेमपूर्वक फिर से उन्हें भोजन कराया।
संदेश:
ईश्वर केवल भक्ति के गीत या मंत्रों में नहीं, जीवों की सेवा में भी निवास करते हैं। जो निंदा करता है, वह भी उसी परमात्मा का अंश है। उसका आदर करना ही सच्ची भक्ति है।https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233
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