बहुत साल पहले की बात है। एक गाँव में आनंद नाम का युवक रहता था। वह बहुत ही आलसी था, लेकिन दिल का भोला-भाला था। उसे कोई भी काम करना पसंद नहीं था। दिनभर खाता, सोता और बस मस्ती करता। घरवालों ने तंग आकर उसे घर से निकाल दिया और कहा, https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"जब तक मेहनत करना नहीं सीखोगे, तब तक वापस मत आना!"
आनंद मजबूरी में घर से निकल पड़ा। वह यूं ही इधर-उधर भटकता रहा और एक दिन एक आश्रम में पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि गुरुजी के शिष्य बस पूजा-पाठ करते और भजन गाते हैं, कोई भारी काम नहीं करते।
आनंद को यह देखकर बहुत अच्छा लगा। उसने सोचा, "वाह! यह तो मेरे लिए सबसे सही जगह है। बस भजन गाना है और खाना खाना है!"
वह गुरुजी के पास गया और बोला, https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"गुरुजी, क्या मैं यहाँ रह सकता हूँ?"
गुरुजी मुस्कुराए और बोले, "हाँ, क्यों नहीं!"
आनंद बोला, "लेकिन मैं कोई काम नहीं कर सकता।"
गुरुजी ने कहा, "यहाँ कोई भारी काम नहीं करना होता, बस प्रभु की भक्ति करनी होती है।"
आनंद खुशी-खुशी मान गया और आश्रम में रहने लगा।
एकादशी का उपवास और भूख की परीक्षा
अब आनंद को बिल्कुल चिंता करने की जरूरत नहीं थी। दिनभर आराम, भजन, और स्वादिष्ट भोजन! लेकिन एक दिन आश्रम में एकादशी आ गई।
सुबह-सुबह आनंद को बहुत तेज भूख लगी। वह रसोईघर में गया, लेकिन वहाँ कोई खाना बनता नहीं दिखा। उसने सोचा कि शायद थोड़ा देर से बन रहा होगा।
थोड़ी देर बाद वह गुरुजी के पास पहुँचा और पूछा, "गुरुजी, आज खाना क्यों नहीं बना?"
गुरुजी बोले, https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"बेटा, आज एकादशी है। आज सबका उपवास रहेगा, तुम्हें भी रखना होगा।"
आनंद घबरा गया, "नहीं! अगर मैंने उपवास कर लिया, तो कल का दिन ही नहीं देख पाऊँगा! मुझे तो बहुत भूख लगती है!"
गुरुजी हँसकर बोले, "ठीक है, तुम उपवास मत करो। लेकिन आज तुम्हारे लिए खाना कोई और नहीं बनाएगा। तुम्हें खुद ही बनाना होगा!"
आनंद को मजबूरन रसोई में जाना पड़ा। लेकिन इतने में गुरुजी फिर आए और बोले, "एक बात याद रखना, जब खाना बना लो तो सबसे पहले भगवान राम को भोग लगाना। और हाँ, खाना आश्रम में मत बनाओ, नदी के उस पार जाकर बनाओ!"
आनंद को कोई और चारा नहीं दिखा। उसने लकड़ी, आटा, तेल, घी और सब्जियाँ उठाईं और नदी के पार चला गया। जैसे-तैसे खाना बनाया। लेकिन खाने बैठा तो याद आया कि गुरुजी ने कहा था कि https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233रामजी को भोग लगाना है।
अब आनंद ने ज़ोर से भजन गाना शुरू किया—
"आओ मेरे रामजी, भोग लगाओ जी, प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए।"
लेकिन कोई न आया।
वह बेचैन हो गया, "यह क्या! यहाँ तो भूख लगी है और प्रभु आ ही नहीं रहे! यह कैसा नियम है?"
फिर उसने कहा, "देखो प्रभु, मैं समझ गया कि आप क्यों नहीं आ रहे हो। मैंने रूखा-सूखा बनाया है और आपको तो बढ़िया पकवान खाने की आदत है। लेकिन आज आश्रम में भी कुछ नहीं बना है, क्योंकि सब उपवास पर हैं। अगर आपको भूख लगी हो, तो यही भोग खा लो!"
आनंद की इस सरलता पर भगवान श्रीराम मुस्कुराए और माता सीता के साथ प्रकट हो गए!
भक्त की मासूमियत और प्रभु की लीला
आनंद अचंभित रह गया! उसने तो सोचा भी नहीं था कि भगवान सच में प्रकट हो सकते हैं!
लेकिन फिर उसे चिंता हुई। उसने सोचा, "गुरुजी ने तो कहा था कि रामजी आएंगे, लेकिन यहाँ तो माता सीता भी आई हैं! मैंने तो सिर्फ दो लोगों का खाना बनाया है!"
फिर खुद से कहा, https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"चलो कोई बात नहीं, आज इन्हीं को खिला देते हैं।"
उसने सारा खाना भगवान राम और माता सीता को परोस दिया।
खाने के बाद आनंद बोला, "प्रभु, मैं तो भूखा रह गया, लेकिन आपको देखकर अच्छा लगा। अगली एकादशी पर ऐसा मत करना, पहले से बता देना कि कितने लोग आ रहे हैं, और हाँ, थोड़ा जल्दी आ जाना!"
भगवान राम उसकी बात पर हँस दिए और प्रसाद ग्रहण करके चले गए।
अगली एकादशी और चमत्कार
अब आनंद को लगने लगा कि https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233प्रभु हर एकादशी पर आते होंगे और प्रसाद ग्रहण करते होंगे।
अगली एकादशी आई।
गुरुजी से बोला, "गुरुजी, मैं अपना खाना खुद बना लूँगा। लेकिन इस बार थोड़ा ज्यादा अनाज देना, वहाँ दो लोग आते हैं!"
गुरुजी मुस्कुराए और बोले, "भूख के मारे बावला हो गया है!"
इस बार आनंद ने तीन लोगों का खाना बनाया और फिर भजन गाने लगा—
"प्रभु राम आइए, सीताराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए!"
लेकिन इस बार भगवान राम अकेले नहीं आए। वे लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और हनुमानजी को भी साथ ले आए!
आनंद को चक्कर आ गए! "यह क्या! एक बार दो लोग आए, अब पूरा खानदान आ गया!"
वह फिर से भूखा रह गया, लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि उसके बनाए भोजन का भोग प्रभु ने स्वीकार किया।
गुरुजी का संशय और आनंद की भक्ति
अब गुरुजी को संदेह हुआ। उन्होंने सोचा, "आनंद हर बार इतना अनाज क्यों माँगता है? कहीं यह बेचता तो नहीं?"
अगली एकादशी पर उन्होंने आनंद को जितना अनाज चाहिए था, देने के लिए कहा और फिर चुपचाप उसका पीछा करने लगे।
इस बार आनंद ने सोचा, "पहले खाना नहीं बनाऊँगा। पता नहीं कितने लोग आ जाएँ!"
फिर उसने भजन गाया—
"प्रभु राम आइए, श्रीराम आइए, मेरे भोजन का भोग लगाइए!"
इस बार पूरा राम दरबार आ गया! हनुमानजी भी साथ आए!
लेकिन यह क्या? प्रसाद तो तैयार ही नहीं था!
भगवान राम ने पूछा, "भक्त, इस बार खाना क्यों नहीं बनाया?"
आनंद बोला, "प्रभु, हर बार मुझे खाना मिलता नहीं, तो इस बार सोचा कि आप ही बना लो और खुद ही खा लो!"
भगवान राम हँस दिए, माता सीता भी गद्-गद् हो गईं।
रामजी ने लक्ष्मण से कहा, https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233"चलो, भक्त की इच्छा पूरी करनी होगी।"
लक्ष्मण ने लकड़ी इकट्ठी की, माता सीता ने आटा गूंधा और खाना बनाने लगीं।
गुरुजी यह सब देखकर चौंक गए! उन्हें प्रभु नहीं दिख रहे थे!
आनंद ने कहा, "गुरुजी, आप देख नहीं रहे? प्रभु खुद खाना बना रहे हैं!"
गुरुजी रो पड़े, "मैंने सब सीखा, लेकिन सरलता नहीं सीखी। प्रभु को पाने के लिए मन की सरलता चाहिए!"
भगवान राम प्रकट हुए और गुरुजी को भी दर्शन दिए।
इस तरह एक भोले-भाले भक्त की भक्ति ने स्वयं भगवान को सेवा में लगा दिया!
शिक्षा: https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-9937615590363233सरलता और सच्ची भक्ति से ही प्रभु की प्राप्ति होती है!
0 Comments