बहुत समय पहले की बात है। विजयपुर राज्य में राजा विक्रमदेव का शासन था। वे बहुत न्यायप्रिय और बुद्धिमान राजा थे। एक दिन उन्होंने अपने दरबारियों की बुद्धिमत्ता परखने के लिए एक अजीब घोषणा की।
उन्होंने कहा, "जो व्यक्ति मेरे पास सुबह तक सबसे अनमोल चीज़ लेकर आएगा, उसे मैं अपना महामंत्री बनाऊँगा।"
यह सुनकर दरबारी सोच में पड़ गए। कुछ ने सोने-चांदी की वस्तुएँ तैयार कीं, कुछ ने अनमोल रत्न, तो कुछ ने प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ जुटाए।
अगले दिन, सभी दरबारी राजा के दरबार में पहुँचे और अपनी-अपनी चीजें राजा को दिखाई। राजा ने सभी चीजों को ध्यान से देखा, लेकिन संतुष्ट नहीं हुए।
तभी एक गरीब किसान दरबार में आया। उसके हाथ में एक मिट्टी का दिया जल रहा था। राजा ने आश्चर्य से पूछा, "यह क्या है? यह तुम्हारे लिए सबसे अनमोल चीज़ कैसे हुई?"
किसान ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, "महाराज, यह दिया प्रकाश का प्रतीक है। यह ज्ञान, सच्चाई और अच्छाई का प्रतीक है। बिना प्रकाश के हम अंधकार में भटक जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बिना ज्ञान के जीवन अधूरा होता है।"
राजा विक्रमदेव यह सुनकर प्रसन्न हो गए और बोले, "तुम सही कहते हो! ज्ञान से बढ़कर कुछ भी अनमोल नहीं है। तुम्हारी सोच सबसे श्रेष्ठ है। आज से तुम मेरे महामंत्री हो।"
सभी दरबारी हैरान रह गए, और किसान की बुद्धिमानी की प्रशंसा करने लगे।
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