पुराने ज़माने की बात है। एक शहर में एक मशहूर मूर्तिकार था—नाम था अरुण। उसकी बनाई मूर्तियाँ इतनी जीवंत लगती थीं कि लोग उन्हें देखते ही मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लेकिन अरुण के पास एक रहस्य था, जिसे कोई नहीं जानता था—वह अपनी मूर्तियों में एक विशेष काला पत्थर लगाता था, जो रहस्यमयी शक्तियों से भरा हुआ था।
एक दिन, अरुण को राजा के लिए एक भव्य मूर्ति बनाने का आदेश मिला। उसने महीनों की मेहनत के बाद एक अद्भुत मूर्ति बनाई। लेकिन जैसे ही उसने उसमें वह काला पत्थर लगाया, अचानक मूर्ति की आँखें चमक उठीं, और उसकी परछाईं ज़मीन पर हिलने लगी।
रात होते ही अजीब घटनाएँ होने लगीं। महल के लोग कहने लगे कि मूर्ति की छाया अपने आप हिलती है। कुछ ने तो यहाँ तक दावा किया कि उन्होंने मूर्ति को चलते हुए देखा है!
राजा को शक हुआ और उसने अरुण को बुलाया। डर के मारे अरुण ने सारा सच बता दिया—वह काला पत्थर दरअसल एक श्रापित पत्थर था, जिसे अगर किसी निर्जीव वस्तु में डाला जाए, तो वह रात में जीवंत हो जाती थी।
राजा ने तुरंत उस मूर्ति को जलाने का आदेश दिया। लेकिन जैसे ही आग लगाई गई, मूर्ति ज़ोर से हँसी और बोली, "तुम मुझे नहीं मिटा सकते! जब तक मेरी छाया है, मैं हमेशा ज़िंदा रहूँगी!"
राजा ने तुरंत एक विद्वान तांत्रिक को बुलाया। तांत्रिक ने सलाह दी कि मूर्ति की छाया को जलाने के लिए सूर्य की पहली किरण उस पर पड़नी चाहिए। अगले दिन, जैसे ही सूरज की पहली किरण मूर्ति पर पड़ी, वह देखते ही देखते राख में बदल गई।
तब से, अरुण ने फिर कभी काले पत्थर का इस्तेमाल नहीं किया और सच्ची कला के रास्ते पर चल पड़ा।
सीख: कला को स्वार्थ और लालच से जोड़ने पर वह विनाश का कारण बन सकती है।
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