राजस्थान के एक छोटे से गाँव में एक प्राचीन मंदिर था, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसमें एक रहस्यमयी सोने की मूर्ति है। परंतु कोई भी उस मूर्ति को छूने की हिम्मत नहीं करता था क्योंकि कहा जाता था कि वह मूर्ति शापित है।
गाँव का एक लालची व्यापारी, गोपाल, इस बात पर विश्वास नहीं करता था। उसने सोचा, "अगर मैं वह सोने की मूर्ति चुरा लूँ, तो मैं सबसे अमीर आदमी बन जाऊँगा!" एक रात वह चुपचाप मंदिर में घुस गया। मंदिर के अंदर अजीब-सी शांति थी, लेकिन उसकी आँखें सिर्फ सोने की मूर्ति पर टिकी थीं।
जैसे ही उसने मूर्ति को छुआ, एक जोरदार गर्जना हुई। मंदिर के दीवारों पर छायाएँ नाचने लगीं, और मूर्ति से आग की लपटें निकलने लगीं। गोपाल डर के मारे कांपने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
अचानक, मूर्ति से एक गूँजती हुई आवाज़ आई, "तूने लालच में आकर मेरा अपमान किया है। अब तुझे इसका दंड मिलेगा!"
अगली सुबह, गाँववालों ने देखा कि गोपाल अब एक पत्थर की मूर्ति बन चुका था—वैसे ही जैसे उसने चुराने की कोशिश की थी।
गाँववालों ने फिर से मंदिर को साफ किया और प्रण लिया कि वे लालच से दूर रहेंगे। तब से, मंदिर की मूर्ति को सिर्फ सच्चे भक्त ही देख सकते थे, और गोपाल की कहानी एक सबक बनकर गाँववालों को याद दिलाती रही कि लालच का अंत हमेशा बुरा होता है।
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