एक समय की बात है, काशी नगरी में एक अत्यंत क्रूर और शक्तिशाली राक्षस बकासुर का आतंक था। वह निर्दोष लोगों को मारकर खा जाता था और साधु-संतों की तपस्या भंग कर देता था। काशीवासी इस संकट से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की आराधना करने लगे।
भगवान शिव ने उनकी पुकार सुनी और एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर बकासुर के पास पहुंचे। उन्होंने बकासुर को चुनौती दी, "यदि तुम सच में इतने शक्तिशाली हो, तो मेरा भोजन स्वीकार करो और इसे पचा कर दिखाओ।"
बकासुर ने हंसते हुए कहा, "मैं तो पूरे नगर को निगल सकता हूँ, तुम्हारे भोजन की क्या बात है?" शिवजी ने तब उसे एक मुट्ठी राख दी और कहा, "इसे खाकर दिखाओ।"
बकासुर ने अहंकार में आकर वह राख खा ली, लेकिन जैसे ही वह उसके पेट में गई, उसका पूरा शरीर जलने लगा। वह तड़पते हुए शिवजी से क्षमा मांगने लगा। तब भगवान शिव ने कहा, "यह केवल राख नहीं, यह मेरे त्रिनेत्र की अग्नि का अंश है, जो अधर्म को भस्म कर देती है।"
बकासुर ने अपनी भूल स्वीकार की और शिवजी से मोक्ष की याचना की। शिवजी ने उसे मुक्त कर दिया, और तब से काशीवासी निश्चिंत होकर भगवान शिव की भक्ति करने लगे।
कथा से सीख:
यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है, और सच्चे श्रद्धालुओं की रक्षा स्वयं महादेव करते हैं।
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