प्राचीन काल में एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान में लीन थे। उनके प्रिय भक्त और वाहन नंदी हमेशा की तरह उनकी सेवा में लगे हुए थे।
ऋषियों का श्राप
उसी समय कुछ ऋषि कैलाश पर्वत पर आए और नंदी से बोले, "हम भगवान शिव से मिलना चाहते हैं।"
लेकिन नंदी ने कहा, "भगवान ध्यान में हैं, उन्हें बिना उनकी अनुमति के परेशान नहीं किया जा सकता।"
ऋषियों को यह बात अहंकार लग गई। उन्होंने क्रोधित होकर नंदी को श्राप दिया, "तुम हमेशा गंदे और कीचड़ में रहोगे!"
नंदी बहुत दुखी हुए और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे। जब शिवजी ने अपनी समाधि खोली, तो उन्होंने नंदी से कारण पूछा।
भगवान शिव का आशीर्वाद
नंदी ने पूरी बात बताई। भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, "वत्स, यह श्राप भी एक आशीर्वाद है। अब से तुम्हारी पूजा करने वाले भक्त गंगा स्नान के बाद पहले तुम्हें जल अर्पित करेंगे, और फिर मेरी पूजा करेंगे। इससे तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा!"
तब से सभी शिव मंदिरों में भगवान शिव से पहले नंदी को जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई।
कथा से सीख:
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची सेवा और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भगवान अपने भक्तों का हमेशा ध्यान रखते हैं और उनका कल्याण करते हैं।
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