दो घड़े


एक समय की बात है, एक नदी में भारी बाढ़ आ गई। पानी का बहाव इतना तेज था कि वह अपने साथ कई चीजें बहा ले गया। इन्हीं बहाव में दो घड़े—एक ताँबे का और दूसरा मिट्टी का—भी बह रहे थे। ताँबे का घड़ा चमकदार और मजबूत था, जबकि मिट्टी का घड़ा साधारण और नाजुक।

बाढ़ के पानी में बहते-बहते ताँबे के घड़े ने मिट्टी के घड़े की ओर देखा और कहा, "अरे भाई, तुम तो बहुत नाजुक लगते हो। अगर तुम्हें मेरी मदद चाहिए, तो मेरे पास आ जाओ। मैं मजबूत हूँ, तुम्हें मेरे पास रहने से कोई नुकसान नहीं होगा।"

मिट्टी का घड़ा मुस्कुराया और विनम्रता से बोला, "आपकी चिंता के लिए धन्यवाद, पर मैं आपके पास नहीं आ सकता। अगर मैं आपके करीब आ गया और बहाव के कारण हम टकरा गए, तो मेरी तो तुरंत ही टूटकर चूर-चूर हो जाने की संभावना है। बेहतर होगा कि मैं दूर रहकर अपनी गति से बहता रहूँ।"

ताँबे का घड़ा उसकी बात सुनकर हँसा और बोला, "कैसी बेवकूफी की बात कर रहे हो! मैं मजबूत हूँ और तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।" पर मिट्टी का घड़ा शांत और सतर्क रहा।

जल्द ही, तेज बहाव ने दोनों को धक्का दिया। मिट्टी का घड़ा दूर ही रहा, लेकिन ताँबे का घड़ा दूसरे भारी वस्तुओं से टकराकर नदी के किनारे अटक गया। उसकी चमक जाती रही और उसकी स्थिति खराब हो गई। दूसरी ओर, मिट्टी का घड़ा, जो दूर रहकर बहता रहा, सुरक्षित नदी के शांत जल तक पहुँच गया।

सीख: अपनी सीमाओं और कमजोरियों को समझना और उनके अनुसार सावधानी से कार्य करना ही असली बुद्धिमानी है।

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