गंदा कमंडल



एक समय की बात है। एक गांव में एक भिक्षुक रहता था। वह रोज़ सुबह अपने कमंडल को लेकर भिक्षा मांगने निकलता था। वह गांव के अलग-अलग घरों से भिक्षा मांगकर अपनी दिनचर्या चलाया करता था।

गांव में एक घर के पास से गुजरते समय वह रोज़ देखता था कि एक औरत अपनी बहू से जोर-जोर से झगड़ रही होती। वह गुस्से में चिल्लाती और बहू को अपशब्द कहती। यह नज़ारा रोज़ का था, लेकिन भिक्षुक कभी कुछ नहीं कहता और चुपचाप आगे बढ़ जाता।

एक दिन भिक्षुक ने सोचा कि इस समस्या का हल निकालना चाहिए। उसी दिन वह भिक्षा मांगते हुए उस औरत के दरवाजे पर पहुंचा और आवाज़ लगाई, "भिक्षाम देहि।"

औरत बाहर आई और भिक्षुक को देखा। भिक्षुक ने विनम्रता से कहा, "माते, क्या मुझे थोड़ा पानी मिलेगा? मेरा कमंडल गंदा हो गया है, उसे धोना है।"

औरत ने भिक्षुक को पानी दिया। भिक्षुक ने कमंडल को धोते हुए औरत से कहा, "माते, मेरा यह कमंडल बाहर से दिखने में तो साफ है, लेकिन अंदर से यह बहुत गंदा है। इस पर कितनी ही बार पानी डालूं, लेकिन जब तक अंदर की गंदगी साफ नहीं होती, यह साफ-सुथरा नहीं दिखेगा।"

औरत ने भिक्षुक की बात ध्यान से सुनी, लेकिन वह कुछ समझ नहीं पाई। उसने पूछा, "महात्मा, यह आप मुझसे क्यों कह रहे हैं?"

भिक्षुक मुस्कुराते हुए बोला, "माते, जिस तरह मेरा कमंडल बाहर से साफ दिखने पर भी अंदर से गंदा है, उसी तरह हम लोग भी बाहर से भले ही अच्छे दिखें, लेकिन अगर हमारा मन गुस्से, जलन और क्रोध से भरा हो, तो हमारी अच्छाई का कोई मतलब नहीं है। आपकी रोज़ की कड़वी बातें और झगड़े आपके परिवार में अशांति फैला रहे हैं। कृपया अपने मन को शांत करें और अपनी बहू को समझने की कोशिश करें।"

भिक्षुक की यह बात औरत के दिल को छू गई। उसने महसूस किया कि उसका व्यवहार सच में परिवार के माहौल को खराब कर रहा था। उसने तुरंत अपनी गलती मानी और वादा किया कि वह अब से अपनी बहू से प्यार और सम्मान से पेश आएगी।

उस दिन के बाद, उस घर में शांति और सुकून लौट आया। और भिक्षुक, अपने गंदे कमंडल की कहानी सुनाते हुए, गांव के लोगों को सच्चाई और मन की शुद्धता का महत्व समझाने लगा।

शिक्षा: बाहरी सफाई के साथ-साथ मन की शुद्धता भी जरूरी है। अपने क्रोध और ईर्ष्या को त्यागकर ही हम सच्चे सुख और शांति को पा सकते हैं।
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