हर दिन सुबह की पहली किरण के साथ, एक भिखारी गाँव के एक बड़े घर के दरवाजे पर आकर बैठ जाया करता। उसका फटा हुआ कपड़ा और कमजोर शरीर देखकर उसकी गरीबी साफ झलकती थी। वह धीरे-धीरे बोलता, "कुछ खाने को दे दो, मालिक। भगवान आपका भला करेगा।"
लेकिन घर का मालिक, जो अपनी संपत्ति और घमंड के लिए मशहूर था, हमेशा गुस्से में उसे डांट देता। "तेरे जैसे आलसी लोग ही इस देश का सत्यानाश कर रहे हैं। मेहनत कर, भीख मांगने से कुछ नहीं मिलेगा।" इतना कहकर वह दरवाजा बंद कर देता।
भिखारी हर दिन वही बात सुनता, लेकिन उसने दरवाजे पर आना नहीं छोड़ा। वह शांत भाव से बैठा रहता, बिना कोई जवाब दिए। गाँव के लोग भी उसे ताने मारते, लेकिन वह सबकुछ सहन करता रहा।
एक दिन अचानक गाँव में खबर फैली कि उस घर के मालिक को गंभीर बीमारी हो गई है। बड़े-बड़े डॉक्टर बुलाए गए, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बीमारी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। मालिक अब कमजोर हो चुका था, और उसका घमंड भी चूर हो गया था।
एक सुबह, जब भिखारी हमेशा की तरह दरवाजे पर आया, तो घर का मालिक खुद लड़खड़ाते हुए बाहर आया। उसकी आँखों में लाचारी थी। उसने कहा, "मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे हमेशा अपमानित किया। आज मैं समझता हूँ कि घमंड और धन कुछ नहीं है। मुझे तेरा आशीर्वाद चाहिए।"
भिखारी मुस्कुराया और बोला, "मालिक, मैं यहाँ तुम्हें कुछ सिखाने आया था। जीवन में दया और विनम्रता ही सच्चा धन है। मैं भिखारी नहीं हूँ, बल्कि एक साधु हूँ। मैंने तुम्हारी परीक्षा ली और तुम्हें बदलते देखा। अब मैं जा रहा हूँ, पर याद रखना, जो दूसरों को देता है, वही सच्चा अमीर है।"
इतना कहकर वह साधु वहाँ से चला गया। मालिक की आँखों से आँसू बह निकले। उसने अपना शेष जीवन गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा में लगा दिया। उसका घर अब एक आश्रय बन गया, जहाँ कोई भूखा नहीं लौटता था।
सीख: दया, विनम्रता और सेवा का भाव ही सच्चा जीवन है। धन और घमंड से केवल अकेलापन मिलता है।
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