एक बार एक छोटे से गाँव में एक मुर्गा और एक लोमड़ी रहते थे। मुर्गा रोज़ सुबह अपनी कूक से सबको जगाता और खेतों में घूमता। वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहता। एक दिन, जब मुर्गा अपने आंगन में बैठकर आराम कर रहा था, एक लोमड़ी ने उसे देखा। लोमड़ी ने सोचा कि यह अच्छा मौका है, मुर्गे को अपने जाल में फंसाया जाए।
लोमड़ी ने चालाकी से मुर्गे के पास जाकर कहा, "प्रिय मुर्गे, मुझे भगवान का संदेश मिला है। वह चाहते हैं कि सभी जीव-जंतु और पक्षी अब एक-दूसरे से प्यार और मित्रता से रहें, कोई किसी को न हानि पहुँचाए।" मुर्गा समझदार था और उसने यह सोचा कि यह एक चाल हो सकती है।
मुर्गा बोला, "तुम सही कह रही हो, लोमड़ी। भगवान का संदेश सच में बहुत अच्छा है। लेकिन, तुम मुझसे पहले अपने पेट की भूख को शांत करो। मेरे पास तुमसे बात करने के लिए बहुत समय है, बस थोड़ी देर में मैं तुम्हारे साथ अच्छे से बातचीत करूँगा।"
लोमड़ी मुर्गे की बातों को सुनकर थोड़ी चौंकी, लेकिन वह भूख से बहुत परेशान थी, इसलिए उसने मुर्गे की बात मानी और नीचे उतर आई। जैसे ही लोमड़ी नीचे उतरी, मुर्गा एक साथ उड़कर पेड़ की ऊँची शाखा पर जा बैठा। अब वह सुरक्षित था और लोमड़ी को यह समझ में आ गया कि मुर्गा बहुत चालाक है।
लोमड़ी ने सोचा कि अगले दिन फिर कोशिश करेगी, लेकिन मुर्गे ने उसे सिखाया कि हमेशा अपनी समझदारी से दूसरों की चालों से बचना चाहिए।
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