बहुत समय पहले की बात है, एक राजा था जो कला और शिल्पकला का बहुत बड़ा प्रेमी था। उसने अपने महल के लिए एक भव्य मूर्ति बनवाने की योजना बनाई। उसने पूरे राज्य में यह घोषणा करवाई कि जो कोई सबसे सुंदर मूर्ति बनाएगा, उसे इनाम दिया जाएगा।
यह सुनकर एक गरीब मूर्तिकार ने भी भाग लेने का निर्णय लिया। लेकिन उसके पास अच्छे औजार और सामग्री नहीं थे। उसने अपनी सारी बचत खर्च करके कुछ औजार और पत्थर खरीदे। वह दिन-रात मेहनत करता रहा।
जब प्रतियोगिता का दिन आया, तो सभी मूर्तिकार अपनी-अपनी मूर्तियां लेकर राजा के सामने पहुंचे। राजा ने हर मूर्ति को ध्यान से देखा, लेकिन उसे किसी में भी वो अनोखापन नहीं दिखा जिसकी उसे तलाश थी।
फिर गरीब मूर्तिकार अपनी मूर्ति लेकर आया। उसकी मूर्ति में इतनी सुंदरता और जीवन जैसा यथार्थ था कि हर कोई उसे देखकर चकित रह गया। राजा ने उससे पूछा, "तुमने इतनी सुंदर मूर्ति कैसे बनाई?"
मूर्तिकार ने विनम्रता से कहा, "महाराज, मैंने अपने दिल और आत्मा से इसे बनाया है। जब मैं इसे बना रहा था, तो मैंने खुद को इसमें देखा और इसे अपनी सबसे बड़ी कृति समझा।"
राजा उसकी ईमानदारी और मेहनत से प्रभावित हुआ और उसे इनाम के साथ अपना मुख्य शिल्पकार नियुक्त कर लिया।
नैतिक शिक्षा:
सच्चे मन और मेहनत से किया गया काम हमेशा सराहा जाता है। ईमानदारी और आत्मविश्वास से हर बाधा को पार किया जा सकता है।
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