राजा और चार मित्रों की कहानी

प्राचीन समय की बात है। एक राज्य में एक न्यायप्रिय राजा राज करता था। उसके चार घनिष्ठ मित्र थे, जो हमेशा उसके साथ रहते थे। राजा उनके सुझावों पर अमल करता और उनकी सलाह से शासन करता।

एक दिन राजा ने सोचा, "क्या ये चारों मित्र मेरे सच्चे हितैषी हैं?"
राजा ने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसने अपने मंत्री को बुलाया और कहा, "मैं बीमार होने का नाटक करूंगा। यह देखना चाहता हूं कि मेरे मित्र मेरी बीमारी पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे।"

राजा ने कुछ दिनों तक अपने महल में बीमार होने का अभिनय किया। यह खबर उसके चारों मित्रों तक पहुंची।
पहला मित्र राजा से मिलने आया और कहा, "महाराज, आपकी हालत देखकर मुझे बहुत दुःख हो रहा है। अगर आपकी तबीयत नहीं सुधरी, तो मैं दूसरे राज्य में चला जाऊंगा।"
यह सुनकर राजा समझ गया कि यह मित्र केवल स्वार्थी है।

दूसरे मित्र ने आकर कहा, "महाराज, आपकी बीमारी से मैं चिंतित हूं। मैं आपके इलाज के लिए सबसे अच्छे वैद्य को बुलाऊंगा। लेकिन अगर कुछ हो गया, तो मैं आपका उत्तराधिकारी बनना चाहूंगा।"
राजा ने समझा कि यह मित्र लालची है।

तीसरा मित्र आया और बोला, "महाराज, मैं आपके लिए कुछ भी करूंगा। लेकिन मेरी भी कुछ सीमाएँ हैं। आपकी बीमारी से ज्यादा मेरा परिवार मेरे लिए महत्वपूर्ण है।"
राजा ने महसूस किया कि यह मित्र केवल आंशिक रूप से निष्ठावान है।

अंत में चौथा मित्र आया। उसने कहा, "महाराज, मैं आपकी बीमारी का कारण जानने के लिए दिन-रात एक कर दूंगा। अगर जरूरत पड़ी, तो मैं अपनी जान भी दे दूंगा, लेकिन आपको ठीक करके ही रहूंगा।"
राजा को यह सुनकर सच्ची खुशी हुई। उसने समझ लिया कि चौथा मित्र ही उसका सच्चा साथी है।

नैतिक शिक्षा:

संकट के समय ही सच्चे मित्र की पहचान होती है।

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