kahani hindi story"प्रकृति की छाया में ज्ञान की गूंज"


एक बार एक बड़े साधु अपने शिष्यों के साथ यात्रा पर जा रहे थे। दोपहर का समय था, सूरज आग बरसा रहा था, और रास्ता बहुत कठिन लग रहा था। साधु ने अपने शिष्यों से कहा, "चलो, किसी छायादार स्थान पर ठहरकर विश्राम करते हैं।"

चलते-चलते उन्हें एक बड़ा घना पेड़ दिखाई दिया। साधु ने उस पेड़ की ओर इशारा किया और कहा, "यहीं रुकते हैं। यह पेड़ हमारी थकान मिटाने के लिए पर्याप्त है।" सभी शिष्य पेड़ के नीचे बैठ गए और पेड़ की छाया में ठंडी हवा का आनंद लेने लगे।

कुछ समय बाद साधु ने देखा कि उनके कुछ शिष्य पेड़ के पत्तों को तोड़कर खेल रहे थे, तो कुछ टहनियों को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। साधु ने उन्हें रोका और कहा, "रुको! इस पेड़ ने हमें छाया दी, हमें शीतलता दी। क्या हमें इसके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए?"

शिष्य थोड़ा झिझक गए और बोले, "गुरुजी, यह तो बस एक पेड़ है। इसे क्या फर्क पड़ता है?"

साधु मुस्कुराए और बोले, "यह सच है कि यह पेड़ बोल नहीं सकता, लेकिन यह हमें बिना किसी स्वार्थ के अपनी छाया दे रहा है। अब सोचो, अगर हर कोई इसे नुकसान पहुंचाएगा, तो यह कितना समय तक हमें लाभ दे सकेगा? प्रकृति हमें बहुत कुछ देती है, लेकिन हमें भी इसे कुछ लौटाना चाहिए।"

साधु ने शिष्यों से कहा, "चलो, अब इस पेड़ को धन्यवाद देने का समय है।" उन्होंने शिष्यों को आसपास गिरी सूखी पत्तियां और टहनियां इकट्ठा करने के लिए कहा। सबने मिलकर वहां सफाई की। एक शिष्य ने पास के कुंए से पानी लाकर पेड़ को सींचा।

साधु ने कहा, "यह जीवन का नियम है। जो हमें देता है, हमें उसका आदर करना चाहिए। यह पेड़ हमें छाया दे रहा है, तो हमारा कर्तव्य है कि हम इसका ख्याल रखें। प्रकृति हमें बिना मांगे देती है, लेकिन अगर हम इसे नष्ट करेंगे, तो भविष्य में हमें ही इसकी कमी महसूस होगी।"

सभी शिष्य साधु की बात से सहमत हुए। उन्होंने प्रण लिया कि वे हमेशा प्रकृति की रक्षा करेंगे और उसका सम्मान करेंगे।

उस दिन साधु ने एक साधारण घटना के माध्यम से अपने शिष्यों को जीवन का एक बड़ा पाठ पढ़ाया: "प्रकृति की सेवा, मानवता की सेवा है।"
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