यह कहानी एक छोटे से मासूम बच्चे की है, जिसने ईश्वर को खोजने की ठान ली थी। आठ साल का वह बच्चा, मटमैले कपड़ों में, एक रुपये का सिक्का अपनी नन्ही मुठ्ठी में कसकर पकड़े हुए था। उसकी आंखों में मासूमियत और सवालों का समंदर झलक रहा था।
वह पास की एक दुकान में गया और दुकानदार से पूछा, "क्या आपकी दुकान में ईश्वर मिलेंगे?"
दुकानदार, जो अपनी बिक्री में व्यस्त था, इस सवाल पर चौंक गया। उसने हंसते हुए बच्चे से पूछा, "ईश्वर? वो भला दुकान में कैसे मिल सकते हैं? तुम ऐसा क्यों पूछ रहे हो, बेटा?"
बच्चा गंभीरता से बोला, "मुझे ईश्वर से बात करनी है। माँ कहती है कि ईश्वर हर किसी की मदद करते हैं। पापा बहुत बीमार हैं, और डॉक्टर ने कहा कि अब केवल चमत्कार ही उन्हें बचा सकता है। तो मैं ईश्वर को खरीदने आया हूं। मेरे पास एक रुपया है। क्या ये काफी होगा?"
दुकानदार का दिल पिघल गया
दुकानदार यह सुनकर अवाक रह गया। उसकी आंखें भीग गईं। उसने देखा कि बच्चा पूरी सच्चाई और मासूमियत से अपनी बात कह रहा था।
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, मेरी दुकान में ईश्वर जरूर हैं। रुको, मैं उन्हें निकालकर लाता हूं।"
दुकानदार की अनमोल मदद
दुकानदार भीतर गया और एक कागज पर कुछ लिखने लगा। उसने बच्चे को एक चॉकलेट के साथ वह कागज दिया और कहा, "यह लो, ये चिट्ठी ईश्वर के नाम है। इसे अपने पापा के पास ले जाओ। सब ठीक हो जाएगा।"
बच्चा खुश होकर दुकान से चला गया। दुकानदार ने तुरंत एक डॉक्टर, जो उसका दोस्त था, को फोन किया और बच्चे के घर के पते पर जाने को कहा।
असली चमत्कार
डॉक्टर बच्चे के पापा का इलाज करने घर पहुंचा। उन्होंने तुरंत उपचार शुरू किया। कुछ ही दिनों में बच्चे के पापा पूरी तरह से ठीक हो गए।
बच्चे की माँ ने उस डॉक्टर से पूछा, "हमने तो आपको बुलाया नहीं था। आप यहां कैसे आए?" डॉक्टर ने मुस्कुराकर जवाब दिया, "मुझे एक रुपये के चमत्कार ने भेजा है।"
अंतिम दृश्य
बच्चा अपने पापा को ठीक होता देखकर खुशी से झूम उठा। उसने अपनी माँ से कहा, "देखा, माँ! मैंने ईश्वर को खरीद लिया।"
उस दिन दुकानदार, डॉक्टर, और बच्चे की मासूमियत ने यह साबित कर दिया कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारी दया और मदद की भावना में बसते हैं।
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