प्राचीन समय की बात है। एक राजा ने अपने राज्य में भव्य रामकथा का आयोजन किया। उसने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि राज्य के सभी ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाए। राजा चाहता था कि हर कोई भगवान राम के आदर्शों और गुणों को जान सके।
आयोजन के दिन सभी विद्वान ब्राह्मण कथा स्थल पर एकत्र हुए। राजा ने सबको उनकी योग्यता के अनुसार यथा स्थान बिठाया। लेकिन उनमें एक ब्राह्मण ऐसा भी था जो पढ़ना-लिखना नहीं जानता था। वह ब्राह्मण अंगूठा छाप था।
राजा ने जब देखा कि वह ब्राह्मण कथा नहीं पढ़ पा रहा है, तो उसने क्रोधित होकर कहा, "तुम ब्राह्मण हो, फिर भी पढ़ना-लिखना नहीं जानते? तुम्हारा यहां आना व्यर्थ है।"
ब्राह्मण ने विनम्रता से उत्तर दिया, "महाराज, मैं सचमुच पढ़ा-लिखा नहीं हूं, लेकिन मुझे भगवान राम से अत्यधिक प्रेम है। उनकी महिमा सुनना और उनके चरणों में मन लगाना ही मेरा धर्म है।"
राजा ने उसकी बातों को अनसुना कर दिया और उसे कथा स्थल से जाने का आदेश दिया। ब्राह्मण चुपचाप वहां से चला गया, लेकिन उसने कथा स्थल के बाहर ही एक कोने में बैठकर भगवान राम का ध्यान करना शुरू कर दिया।
उसी रात, राजा ने एक सपना देखा। भगवान राम स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और कहा, "हे राजा, तुमने उस ब्राह्मण का अपमान किया है जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है। पढ़ाई-लिखाई से बड़ा है भक्ति और सच्ची भावना। वह ब्राह्मण मेरे लिए सबसे प्रिय है।"
सपने से जागते ही राजा व्याकुल हो उठा। उसने तुरंत उस ब्राह्मण को खोजने का आदेश दिया। ब्राह्मण जब मिला, तो राजा ने उसके चरणों में गिरकर क्षमा मांगी और उसे कथा स्थल पर मुख्य स्थान पर बिठाया।
इसके बाद, रामकथा पूरे जोश और श्रद्धा के साथ पूरी हुई। राजा ने सीखा कि भगवान के प्रति प्रेम और सच्चाई ही सबसे बड़ी पूजा है।
यह कहानी सिखाती है कि भगवान की भक्ति के लिए विद्या नहीं, बल्कि सच्चे मन और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
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